नवगीत – दुलरुआ फाग

कुमार गौरव अजीतेन्दु

ग्यारहों मासों का

इकलौता दुलरुआ फाग

देखते उसको उतरतीं

पूस-माघी त्योरियाँ

चैत्र ले के गोद में

रहता सुनाता लोरियाँ

जेठ और बैसाख

रखते दूर अपनी आग

सानते भूले नहीं

सावन या भादो कीच में

टोकने आते नहीं हैं

क्वार-कातिक बीच में

नेह अगहन का मिले

आषाढ़ रखता लाग

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