रिजल्ट का डर और बोझ कब तक संभालें बच्चे

सुशील शर्मा

एक बच्ची जो बहुत गरीब परिवार से थी सरकारी स्कूल में पढ़ती थी बहुत ज्यादा होशियार नहीं थी ,घर का वातावरण भी ऐसा नहीं था की कोई उसे उत्साहित करे ,घर के सारे काम भी उसे ही करने पड़ते थे आखिर कैसे भी करके उसने 10 बोर्ड की परीक्षा दी जाहिर था पढ़ा नहीं तो असफल हो गई बहुत रोइ उसके शिक्षक ने समझाया बेटा कोई बात नहीं अगली बार अच्छे से तैयारी करके परीक्षा देना निकल जाओगी ,घर वाले आगे पढ़ाना नहीं चाहते थे क्योंकि उनकी जाति में ज्यादा पढ़ी लिखी लड़की की शादी नहीं होती थी बहुत विरोध हुआ लेकिन लड़की ने हार नहीं मानी फिर परीक्षा दी लेकिन परिणाम वही फेल ,लड़की बहुत रोइ लेकिन टूटी नहीं न ही अपने लक्ष्य से डिगी अगले साल प्राइवेट फॉर्म भर कर परीक्षा दी और अस्सी प्रतिशत मार्क्स के साथ पास किया उसके बाद ऐसी लगन लगी की सारी परीक्षाएं और UPSC  निकाल कर IAS बनी और आज वह एक सफल प्रशासक है। यह उदाहरण दर्शाता है कि जीवन में असफलताएं कभी स्थायी नहीं होती।

दसवीं का इम्तहान देते वक्त बच्चे अपने जीवन के सबसे संवेदनशील दौर में होते हैं। इस कच्ची उम्र में मन पर पड़ने वाला असहनीय दबाव बच्चे की जीवन दृष्टि को तहस-नहस कर सकता है। इसीलिए पहले भी दसवीं के बच्चों की आत्महत्या की घटनाएं ज्यादा घटती थीं, जिसको ध्यान में रखकर उन पर बोर्ड का दबाव हटाया गया था। इसके पीछे यह उम्मीद काम कर रही थी कि बच्चे दबावमुक्त होकर पढ़ेंगे तो कुछ बेहतर सीख पाएंगे। मुझे एक बात कभी भी समझ नहीं आयी कि क्यों सभी उनके बच्चे सबसे ज्यादा अंक लेने की अंधी दौड़ में लगातार बच्चों को ढकेलने में गर्व महसूस करते हैं।  बच्चों को भी जीने का और हमारी ही तरह बचपन में बचपना  करने की स्वतंत्रता जरूर मिलनी चाहिए।  हम दुर्भाग्यवश उनसे बहुत कुछ अनजाने ही छीनने की गलती करते हैं।  जिस दिन 12 का रिजल्ट आना होता है ,  ज्यादातर उनको अपने मां और पिता का सामना करने का धैर्य नहीं होता। आखिर ये डर  क्यों? वैसे भी भारत में दसवीं पास करने से लेकर नौकरी या करियर शुरू होने तक एक लंबा समय बच्चों को जद्दोजहद में बिताना पड़ता है। इस संघर्ष की शुरुआत थोड़ी देर से होने में कोई हर्ज नहीं था। इसके उलट राय यह है कि चौदह-पंद्रह की उम्र से ही उन्हें भावी प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जाए। ऐसा सोचने वाले दसवीं के स्तर पर बोर्ड की अनिवार्यता के प्रबल समर्थक रहे हैं। इसी सोच का नतीजा है कि हमारी पूरी परीक्षा प्रणाली में कुछ भी सीखने, ज्ञान अर्जित करने और किसी तरह के अन्वेषण की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। बच्चे को कम उम्र से ही कोल्हू के बैल की तरह सिलेबस रटने में लगा दिया जाता है और यह प्रकिया प्रशासनिक परीक्षाओं की उम्र निकल जाने तक जारी रहती है।

कुछ समय के लिए अपनी परीक्षा में जोअसफलता मिली है , उसे आत्मसात न करें और अपनी भावनाओं को गहराई तक जाने दें। अभी आप जो अनुभव कर रहे हैं, वह सिर्फ आपको बता रहा है कि आप अपने जीवन में असफल रहे हैं, लेकिन परिणाम से कुछ दिन पहले की सोचें,कि आप कितने दृढ़ प्रतिज्ञ थे  मुझे यकीन है, आपको यह दुख नहीं होगा। अपने जीवन में आपके पास मौजूद सभी सुखद क्षणों की कल्पना करें, जो अच्छे अनुभव आपने अपने प्रियजनों के साथ किए थे, उन्हें याद करें। याद रखें, विचार सिर्फ अस्थायी विद्युत आवेग हैं जो न्यूरॉन्स एक दूसरे के साथ संवाद करने के लिए उपयोग करते हैं। नकारात्मक विचार, वास्तविक खतरा है उन्हें अपने नजदीक न आने दें किसी भी नकारात्मक भावनाओं को समझें , वे झूठी हैं और वे निराधार हैं।

अच्छी ऊर्जा के साथ खुद को संभालें । यह सोचकर कि आप सभी प्रयासों में असफल हो जाएंगे, आप स्वयं को सिर्फ निराश करेंगे। जीवन एक लंबी यात्रा है जिसमें सफलता असफलता आती रहती हैं । हमेशा याद रखें कि आप उन लोगों की कहानियों से हमेशा खुश रह सकते हैं जो सफल होने से पहले कई बार असफल हुए।

आपको अपने कमजोर बिंदुओं पर पता होना चाहिए कि आप क्यों असफल होते जा रहे हैं। शायद इससे आपको मानसिक रूप से तैयारी में मदद मिलेगी।

हमेशा ऐसे लोगों के साथ रहें जो आपका समर्थन करते हैं। अगर कोई नहीं हैं, तो चिंता न करें। आपका अपना स्व है। अपने आप पर भरोसा करना एक लंबा रास्ता तय करता है। परीक्षा के अलावा अपने मूल्य और आत्म सम्मान को मापें। विफलता घातक नहीं है और सफलता भी अंतिम नहीं है।

आपका जीवन अमूल्य और आपका भविष्य उज्जवल है।

Author: admin

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