तपता सूरज

तपता सूरज झुलसाता फिर थम जाता बनकर के प्रहरी

साँझ हुई सब घर लौटे क्यों मौन खड़ा ढल गई दुपहरी ।

कागज पे सब व्यापार बना उड़ गया हवा कब ठहरी

क्या पुण्य बना क्या पाप बना जीवन नैया कब ठहरी ।

पा लूँ कितना कि मन की खाई भर जाये जो है गहरी

मन अभिलाषा में सौ बार जला लेकिन चाह  कब ठहरी

रुक रुक ,सौ बार कहे अंतस, थम जा अब हो गयी देरी

पाथर जोडूं मन को तोड़ूँ अब रुकूँ कहाँ  हो गयी देरी ।

सपना भर सब संसार रहा, कब आँख खुली नींद गहरी थम गयी

साँस रह गयी बात मन की मन में जो थी गहरी ।

अंशु प्रधान

Author: admin

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