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कर्मयोगी बन करे जो काम

डॉक्टर सुधीर सिंह जग के सोने पर जो जगता,कृष्ण ने उन्हें  कहा है योगी.चौकीदार भी तब  जगता है, रात में जब सोता सब भोगी.जनप्रतिनिधि ही जनता को,जागरूक  सदा   रखता   है.चतुर्दिक विकास के लिए ही,निरंतर प्रयत्नशील  रहता है.देशभक्ति हो जिसके रग-रग, कर्मयोगी  बन करे जो काम,सेवाभाव हो  जिसके मन में,लक्ष्य हो विकसित हिंदुस्तान.वैस…

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हूटर

मुझे  फैक्ट्री के सारे मुलाजिम हमेशा ही फैक्ट्री में बजने बाले हूटर के गुलाम सरीखे दिखते थे ।हालांकि ये सब नियम से नहाते-धोते ,खाते-पीते थे , लेकिन इनके  जीवन में स्फूर्ति न थी । एक यन्त्रवत जीवन यापन था।एक अनकही यन्त्रणा थी।          सबेरे पांच बजे के हूटर पर मन…

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हक का घर

समीर और सीमा दोनों को बैंक से लोन मिल गया था . और उन्होने ताबड़तोड़ 2बीएचके फ्लेट खरीद लिया था . बस एक ही बात की कसक थी सीमा के मन में कि काश माँ आज जिंदा होती तो कितनी प्रसन्न होती ! सीमा की शादी के वक्त समीर और…

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स्टेटस सिम्बल

किरण ने नई ‘होन्डा सिटी’ ली है अभी, संजीव के प्रमोशन के बाद का ये चमकदार स्टेटस सिम्बल उसकी हर बात में आ जाता है।   ‘जया यहां आ जाओ दो रोज के लिये, नई होन्डा सिटी आ गई है। कहीं घूम लेंगे बच्चों के साथ।’ उसके ऐसे स्निग्ध आमंत्रण…

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कसूर…

बुरी तरह से धक्का खाती हुई वो घर के दरवाजे को पार करती बाहर जा गिरी और साथ ही एक कड़कती आवाज कानों को झिंझोंड़ गयी, ‘ निकल यहां से! अब तेरे लिये इस घर में कोई जगह नहीं। जब से आयी है मनहूसियत फैला रखी है। अगर अब यहां…

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India

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ऐसी किताब दे

कोई हमारे हाथ में ऐसी किताब दे । उलझे हुए सवाल का सीधा जवाब दे सबकी है यह वसुंधरा, सबका है यह गगन सबके लिये है रौशनी, सबके लिये पवन फिर दो दिलों में क्यों घृणा का बीज पल रहा ? क्यों बांस के जंगल–सा मेरा देश जल रहा ?…

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सिक्के

डॉक्टर सरोजिनी प्रीतम अध्यापिका ने छात्रों को सोलह आने सच का मुहावरा जब बार बार समझाया ’आने‘ के पुराने सिक्के के बारे में बतलाया तोे ’आने के सिक्के-जाने के सिक्के‘ कह-कह कर छात्र हंसे सिर पीटकर अध्यापिका बोली ’छोडो यह मुहावरा वे सोलहों आने तो खर्च हो चुके।‘

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मुझे भी पढ़ लो

सोनाली सिंघल मैं एक किताब हूँ हर किसी के सवालों का जवाब हूँ बोलों क्या जानना चाहते हो तुम तुम्हारे हर सवाल का जवाब है मेरे पास हिम्मत हो तो सुनकर देखो छुपे हैं मुझमें ऐसे गहरे राज़ ज्ञान का भंडार हूँ मैं जीवन का शृंगार हूँ मैं गौर कीजिए ज्ञान…

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बहुत कुछ लिखने के प्रयास में

कभी – कभी ,हम कुछ भी नहीं लिख पाते ।लिखना तो बहुत कुछ चाहा था ,मन में अनेक भावनायें एवं विचार उमड़ – घुमड़ रहे थे ! लिखना आरम्भ भी कर दिया था ,परन्तु क्यों और कैसे लिख कुछ और ही गई !कभी शब्द अर्थ हीन बन गये ,कभी अनेकार्थक ,परन्तु मेरे अभीष्ट को फिर भी न समेट…

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