सम्मानित संरक्षक डॉक्टर सुधीर सिंह जी का साक्षात्कार

मित्रो!

बड़े गर्व एवं उत्साह के पल है, अनुराधा प्रकाशन परिवार में सम्मानित संरक्षक के रूप में डॉक्टर सुधीर सिंह (भागलपुर, बिहार) जुड़े हैं,  आप भागलपुर यूनिवर्सिटी में प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत हुए हैं,

गत तीन वर्षों में आपकी अनुराधा प्रकाशन से 5 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमे जीवन मूल्य, राष्ट्रीय मूल्य एवं मानवीय मूल्य कूट कूट कर भरे हैं

जैसा हमने कहा था कि प्रकाशन परिवार के सभी सम्मानित संरक्षक सदस्यों का इंटरव्यू ‘उत्कर्ष मेल न्यूज़ पोर्टल’ में तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित, प्रचारित किया जायेगा.

आइये अब साक्षात्कार को प्रारंभ करते हैं, और जाने आपका शुन्य से शिखर तक का उनका सफ़र कैसा रहा.

यह साक्षात्कार अनुराधा प्रकाशन की सम्मानित संरक्षक एवं क्रिएटिव डायरेक्टर (मानद),  श्रीमती कविता मल्होत्रा जी ने लिया है

प्रश्न -1

आदरणीय सुधीर जी, शिक्षण कार्य से सेवा निवृत्ति के बाद लेखक के रूप में आपका पुनर्जन्म वाक़ई हमारी भावी पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। विज्ञान विषय से आम आदमी के मन की बात तक का सफर आपने कैसे तय किया ?

उत्तर :

कविता जी , एक विज्ञान का छात्र रहते हुए भी मुझे छात्र-जीवन से ही हिंदी के प्रति मधुर लगाव रहा है और  वही नैसर्गिक आकर्षण मेरी लेखनी के लिए आजतक चिंतन-ऊर्जा का असीम स्रोत है.मेरे गुरुजन सिखाते रहे कि विज्ञान सत्य की खोज करता है. सत्य की अनुभूति जब  अभिव्यक्ति के रूप में विचार बनकर बाहर आता है तो साहित्य का सृजन होता है.जिंदगी का सारा विकास विचार का विकास है.व्यक्ति के साथ ही विचार पैदा होता है. विचार स्वयं एक प्रभावशाली ऊर्जा है. साहित्य-सृजन का वही मूल स्रोत है. ह्रदय और बुद्धि के सम्मिलन से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह मनुष्य को सम्यक-दृष्टि और अद्भुत सृजन-शक्ति देता है.जब किसी इंसान को अपने सफ़र के आदि और अंत की जानकारी हो तो वह अपनी  जागृत चेतना, धैर्य और अथक अध्यवसाय से सत्पथ का चयन कर आसानी से मंजिल तक पहुँच सकता है. विज्ञान विषय से आम आदमी के मन की बात तक का सफर तय करने का यही मेरे लिए मूलमंत्र रहा है और आजीवन रहेगा.

प्रश्न – 2

जहाँ विज्ञान ने आपको शिक्षण के क्षेत्र में एक अनूठी पहचान दी है वहीं आपके समूचे अस्तित्व में विराजमान वेद पुराणों के ज्ञान ने भी आपको उच्च श्रेणी के साहित्यकारों की श्रेणी में रखा है। दोनों ही क्षेत्रों में आपने अपनी विद्वता को बाँटा है। एक क्षेत्र से आपको साँसारिक कमाई हुई है तो दूसरे क्षेत्र से आध्यात्मिक।कैसा अनुभव रहा?

उत्तर :

 विज्ञान हो या कोई अन्य विषय, सबका विकास आदमी के निरंतर चितन पर निर्भर करता है. निरीक्षण, परिकल्पना, प्रयोग, नियम-परिनियम और सिद्धांत के विभिन्न स्तरों से गुजरते हुए विज्ञान अपने लक्ष्य तक पहुंचता है.किंतु साहित्य ह्रदय के बहाव का प्रतीक है.इसी बहाव को हम आत्मचिंतन कहते हैं. चिंतन को सतत परिष्कृत करते रहने से साहित्य-सृजन में सहायता मिलती है.किसी भी समाज का साहित्य विशेष स्थान और काल,सुविज्ञ पाठक,समाज की रूचि, विशेष राजनीति एवं धर्म तत्व द्वारा सृजित, संघठित और नियंत्रित होता है.

  एक प्राध्यापक के रूप ईमानदारी से मैंने भौतिकी की सेवा अपने पूरे सेवाकाल में किया है और उसका उचित पारिश्रमिक भी मिला, मासिक पेंशन के रूप में आज भी मिल रहा है और आजीवन मिलता ररहेगा.मैं अपने प्रिय विषय भौतिकी विज्ञान को ह्रदय से बार-बार नमन करता हूँ. सेवानिवृति के बाद मैंने हिंदी साहित्य की सेवा का शपथ लिया है.मैं अपनी लेखनी का सदुपयोग तबतक करता रहूंगा जबतक मस्तिष्क और स्वास्थ्य सहयोग देगा.मेरी रचना छपे या नहीं छपे, आम लोगों तक पहुंचे या नहीं पहुंचे,मैं अपने अंदर बैठे साईं की पावन प्रेरणा से कि ‘सिर्फ लिखो’ लिखने का पुण्य कार्य करता रहा और करता रहूँगा.मुझे लगता है कि मैं निमित्त मात्र हूँ, लिखाने वाला तो कोई और है जो अंदर बैठा है और प्रतिदिन प्रातःकाल से ही लिखने के लिए प्रेरित करता रहता है. उस साईं को मेरा कोटि-कोटि नमन.सांसारिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों का मेरा यही अनुभव रहा है.

प्रश्न – 3

आपकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो आम आदमी के मन की बात जन जन तक पहुँचाने में सक्षम हैं।ये तो तय है कि सेवा व समर्पण के बिना मानव जीवन कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता, आपको सेवा निवृत्ति के उपरान्त समाज कल्याण की ये प्रेरणा कहाँ से और कैसे मिली?

उत्तर :

 ग्रामीण और शहरी  क्षेत्र के मिक्ष्रित परिवेश में आम आदमी के सान्निध्य में रहकर शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त लगभग उसी परिवेश में अध्यापन कार्य करते रहने से मुझे प्रकृति ,इंसान के व्यक्तिगत जीवन ,परिवार और  समाज में होने वाले उथल-पुथल एवं उतार-चढ़ाव को नजदीक से देखने, समझने और गंभीरता से सुचिंतन  करने का भरपूर सुअवसर मिला है.उसी सुअवसर के सदुपयोग का मधुर फल है :मेरी पांच कृतियाँ ;1.मन की बात 2.प्रेम एक अनुभूति 3.आम आदमी की आवाज 4.बाल विवाह एक अभिशाप और 5.माँ की याद में.

प्रश्न – 4

आपकी सहज भाषा शैली और आम आदमी के मन की बातों पर आपकी गहरी पकड़ आपके व्यक्तित्व की मिलनसारिता की ओर इशारा करती है, उम्र के इस पड़ाव पर आप अपने समय को किस तरह व्यवस्थित करते हैं जिस से आप जन जन के मन को पढ़ सकें?

उत्तर :

निरंतर परिश्रम, पारदर्शी शब्दों को विचारों का वाहक बनाकर,आत्म नियन्त्रण एवं परिक्षण  के फलस्वरूप ही किसी की भी लेखन-शैली तथा भाषा सहज ,सरल और स्पष्ट होती चली जाती है, जिसे पढ़कर किसी भी सुधीजन का प्रभावित  हो जाना स्वाभाविक है.

प्रश्न – 5

हर सफल व्यक्तित्व की कोई न कोई प्रेरणा जरूर होती है,

आप अपने लेखन की सफलता का श्रेय किसे देना चाहेंगे ?

उत्तर

व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन, सामाजिक परिवेश और प्रकृति ही प्रायः सबों के लिए प्रेरणा का स्रोत होता है.आदमी अपने आसपास जो घटनाएं घटित होते हुए  देखता है,उसी पर चितन-मनन कर अपनी लेखनी उठाता है और कुछ लिखना शुरू कर देता है.

  मैं बचपन में अपने बाबूजी के आत्मीय स्नेहिल सानिध्य में रहकर बहुत कुछ सीखा है.वे कहा करते थे कि ‘’किया हुआ कर्म और बोया हुआ बीज अस्तित्व में आने के लिए उचित समय लेता ही है’’. आज भी लगता है कि वे सामने बैठ इसी  सूक्ति को याद दिलाते हुए मुझे कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं,जबकि उनका आवास अनंत में है. माँ तथा बाबूजी को कोटिशः नमन जिनका प्रतिरूप रह आपलोगों के समक्ष कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ.मैं अपनी जीवन संगिनी तथा अपने सभी प्यारे बच्चों के साथ-साथ स्वजन-परिजन को ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने शुभ और चुनौतीपूर्ण स्थितियों में मेरा तहेदिल से साथ दिया. 

प्रश्न – 6

समाज में आपकी भूमिका एक पथ प्रदर्शक की रही है, अब साहित्य जगत में भावी पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिए आपका क्या सँदेश है ?

उत्तर :

बुरा न माने तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हम सबों ने पूर्वजों द्वारा धरोहर के रूप में स्थापित जीवन के उच्च आदर्शों को व्यंग्य  का विषय बनाकर रख दिया है.आजकल व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में नैतिकता का क्षरण इसी का फल है.मानव जीवन से प्रेम स्नेह ,सहयोग ,दया,दान,सहानुभूति ,करुणा आदि मानवीय गुणों ने मुंह मोड़ लिया है ;जिससे व्यक्तिगत  और सामूहिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है .

प्रश्न – 7

ये तो तय है कि सेवा काल बँधन न होकर आत्मानुशासन की स्थिति है,जो किसी साधना से कम नहीं है, आपकी तपश्चर्या आपके लेखन में स्पष्ट झलकती है, इस सहज योग का गुर भी हमारे पाठकों से साझा कीजिए जो एक बुद्धू को बुद्ध बनने की प्रेरणा देता है।

उत्तर :

इस हकीकत से जाने-अनजाने हम सब अवगत रहते हुए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष इसका बुरा परिणाम अच्छी तरह भोग रहे हैं.आपके माध्यम से मैं कहना चाहूंगा कि बचपन से ही बच्चों में मानवीय गुणों को कूट-कूट कर भरना चाहिए. उन्हें सिखाना चाहिए कि जीवन एक कला है.मनुष्य अपने जीवन का कलाकार है. उस कलाकार की कला का सौंदर्य एवं सुगंध उसके कृतित्व और व्यक्तित्व से प्रस्फुटित होता है. बच्चे ही राष्ट्र के भविष्य हैं. बच्चा के जागरूक होते ही राष्ट्र स्वतः जग जाता है और अंततः विश्व गुरु बन भी जाता है.उनके अंदर देशप्रेम की भावना जागृत करना चाहिए.नैतिकवान नागरिक ही देश को प्रगति पथ पर सहजता के साथ ले जा सकता है. समाज के बड़े-बुजुर्गों को भी अपने  शुभ कार्यों से बच्चों को प्रेरित करना चाहिए. आज हमसबों का यह दायित्व है कि युवा वर्ग, किसान, उद्यमी तथा समाज के अन्य तबकों के आशा और उत्साह को सही दिशा देने में  तहेदिल से जुट जांय, हिंदुस्तान चमक उठेगा.इस महान देश को माता के समान सम्मान दें और उसकी यश-कृति में वृद्धि के लिए हमसब एक सजग संतान की तरह निरंतर ईमानदारी के साथ प्रयासरत रहने का पुनीत प्रण लें.

प्रश्न – 8

अनुराधा प्रकाशन से जुड़ाव किस तरह हुआ और आपका अनुभव कैसा रहा ?

उत्तर :

मैं अनुराधा प्रकाशन परिवार के सम्मानित संरक्षक श्रीमती कविता मल्होत्रा जी ,प्रकाशन के मेरुदंड प्रकाशक और  संपादक श्रद्धेय मनमोहन शर्मा ‘शरण’ जी के साथ-साथ इस प्रकाशन से जुड़े सभी सुधीजन  साह्योगियों का बहुत-बहुत आभारी हूँ ,जिन्होंने मेरे जैसे साधारण इंसान की लेखनी को हद से ज्यादा प्यार और  सम्मान देकर अनुगृहित किया है. अंत मैं अपनी इन दो पंक्तियों के साथ लेखनी को विराम देता हूँ-

शुभ कर्म का फल सदा शुभ-ही-शुभ होता है,

जो जैसा करता है, प्रभु से वैसा वह पाता है.

Author: admin

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