श्रेष्ठ व्यावहारिक अध्यात्म व्यक्तित्व 88 वर्षीय एडवोकेट श्री उमाकान्त त्रिपाठी से साक्षात्कार (दिसंबर २००५ में लिया साक्षात्कार)

आज के बदलते परिवेश में परिवारों के विघटन व उससे सम्बंधित बढ़ती समस्याओं के चलते हमने समस्त पाठकों व समाज के निमित्त एक श्रेष्ठ व्यावहारिक आध्यात्मिक  व्यक्तित्व श्री उमाकान्त त्रिपाठी जी का साक्षात्कार प्रस्तुत कर रहे हैं, जिन्होंने बड़ी सफलतापूर्वक अपने बच्चों को शिक्षा–दीक्षा में निपुण किया तथा उन्हें सुसंस्कारित किया । आज उनका प्रत्येक बालक अपने–अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता के शिखर पर हैं परन्तु माता–पिता, भाई–भाभी के प्रति आदर सत्कार का भाव विद्यमान है । आइए उनसे जानें उन्होंने किस प्रकार यह सब सफलतापूर्वक किया तथा परिवार को एकसूत्र में माला के मनकों की भांति पिरोकर रखा–––– कानपुर उत्तर प्रदेश में त्रिपाठी जी का परिवार एडवोकेट परिवार के नाम से विख्यात है । उनके परिवार के सभी सदस्य देश–विदेश में उच्च एवं समृद्ध पदों पर प्रतिष्ठित हैं । प्रभु की सब पर असीम कृपा है ।

          साक्षात्कार आरंभ होने से पूर्व त्रिपाठी जी ने कहा — पत्रिका के मुख पृष्ठ पर व्यावहारिक अध्यात्म  अंकित है । मैं सोचने लगा कि अध्यात्म  से तो हम परिचित हैं यह व्यावहारिक अध्यात्म  क्या है ? और फिर स्वत: ही आत्म चिंतन से उत्तर मिल गया । इस प्रसंग में एक मेरा अनुभव सुनें । कुछ दिन पश्चात मैं मार्किट में शॉपिंग के लिए निकला । एक दुकान में पहुंचा वहां से कुछ खरीदा तो नहीं फिर अगली दुकान में गया । वहां जाकर पैसे देने के लिए ज्यों ही मैंने अपने पर्स को देखा तो मैं परेशान हो गया । पर्स कहीं गिर गया अथवा किसी ने निकाल लिया । उसमें 1900 रुपए थे । पुन: उसी दुकान में लौटा और ढूँढना प्रारंभ कर दिया । एक नवयुवक टकटकी लगाए मुझे घूर रहा था और एकाएक मेरे निकट आकर उसने मुझे मेरा पर्स व समस्त पैसे लोटा दिए । मैंने उससे बहुत कहा कि कुछ पैसे तुम रख लो मिठाई ले लेना । परन्तु उसने तपाक से उत्तर दिया — दादाजी एक बार मन में तो आया था कि दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी जी की कृपा हो गई लगती है । परन्तु तभी आत्मा ने झकझोरा कि दूसरे के दु:ख से मेरे आनन्द का दीप किस प्रकार प्रज्ज्वलित होगा । और मैंने आपको पर्स लौटा दिया । आप यदि कुछ देना ही चाहते हैं तो मुझे आशीर्वाद दीजिए । और वह आगे की ओर चला गया । तब मेरी समझ में आया– व्यावहारिक अध्यात्म  क्या है ?––––

सम्पादक-मनमोहन शर्मा

          श्री उमाकान्त त्रिपाठी जी जन्म 13 मार्च 1917 को कानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ । उन्होंने क्राईस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर (उ–प्र–) से शिक्षा–दीक्षा प्राप्त की । त्रिपाठी जी ने सी–डी–ए– (कन्ट्रोलर डिफेन्स एकाउन्टस) में ऑडिट विभाग में कार्य किया । इस सेवा में विभिन्न स्थानों में स्थानान्तरित हुए ।

मनमोहन शर्मा–   (प्रश्न)

त्रिपाठी साहेब आपकी अत्यन्त प्रशंसा सुनी है । आपने अपने सभी बच्चों को अच्छे संस्कार दिए हैं । इस पर प्रकाश डालें । वे सभी किस क्षेत्र में सेवाएँ दे रहे हैं ।

दादाजी (उत्तर)

देखिए मनमोहन जी, मैंने प्रारंभ से ही एक विचारधारा  को मजबूती से पकड़ा था कि भले ही मुझे फटे–पुराने कपड़े पहनने हों परन्तु बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाऊँगा । जहाँ तक संस्कारों की बात करें तो उस विषय पर मैंने सदैव बच्चों को ईश्वर–निष्ठ, कर्तव्य–निष्ठ तथा सत्यपरायणता की ओर बढ़ने को प्रेरित किया । सत्य के बल और उसके परिणाम के विषय में बताया ।

          जब कभी बच्चों को एकत्र कर आनन्द के क्षणों में उनसे अपने अनुभव बाँटता । ऐसा एक अनुभव आपसे कहता हूँ–––

          मैं CDA (Controller Defence Accounts) में  Audit विभाग में कार्यरत था । मेरा पूरे देश में कहीं भी तबादला हो सकता था । एक बार इसी विषय पर मेरे वरिष्ठ अधिकारी  ने मुझे बुलाया और पूछा — मेरे तबादले/स्थानान्तरण के लिए उन्होंने मुझसे कहा कि अब आपके तबादले का समय निकट है । आप कहाँ जाना चाहते हैं । मैंने तुरन्त उत्तर दिया µ मैंने विभाग में कार्यभार सम्भालने से पूर्व लिखकर दिया है कि मैं देश के किसी भी राज्य में कार्य करने के लिए तैयार हूँ । सो आज भी मुझे याद है । उन्होंने अगला प्रश्न किया — क्या ईश्वर है ? मैंने थोड़ा विचार करके कहा — जी हाँ!

          अगले प्रश्न में उन्होंने कहा — मिस्टर त्रिपाठी वैसे आपके मन में स्थानान्तरण से सम्बंधित  क्या चल रहा है । आप कहाँ पोस्टिंग चाहते हैं ?

          मैंने कहा — जैसा ‘सर’ मैं ऊपर कह चुका हूँ परन्तु सत्य यह है कि मेरी माता जी की तबीयत खराब है । इसलिए मेरी इच्छा है कि उनके आस–पास ही रहूँ, जिससे उनकी सेवा भी कर सकूँ और मन लगाकर निष्ठापूर्वक देश सेवा भी कर सकूँ । मेरे अफसरों ने तुरन्त मेरा तबादला मेरे कहे अनुसार कानपुर में कर दिया । यहाँ मैंने भी सत्य के परिणाम व बल को जाना ।

          इसका प्रभाव मैंने बच्चों पर पड़ते देखा । मेरे बड़े पुत्र एयरकोमोडोर श्रीहर्ष त्रिपाठी जिन्हें मैं चार्टेड एकाउन्टेंट बनाना चाहता था, उन्होंने जब देखा कि इस व्यवसाय में प्राय: झूठ–बेईमानी का सहारा अनेक बार लेना पड़ सकता है, तब श्रीहर्ष ने us CA बनने का इरादा छोड़कर एयरफोर्स ज्वाईन कर लिया और देश सेवा का निर्णय सहर्ष लिया । (श्रीहर्ष अपनी पत्रिका के विधि परामर्श संरक्षक हैं)

          इसके अलावा मेरे सभी बच्चों को स्कॉलरशिप मिलती थी । वे सदैव अध्ययन में श्रेष्ठ रहे हैं ।

मनमोहन (प्रश्न )

          त्रिपाठी साहेब वे (आपके पुत्र) सभी विभिन्न/भिन्न–भिन्न क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं । पृथक–पृथक क्षेत्र में रह रहे हैं । आपने किस प्रकार उन्हें एक सूत्र में बाँधा  है ।

दादा जी —

          मैंने बच्चों को एक दूसरे के प्रति आदरµसेवाµसमर्पण भाव के लिए प्रेरित किया । यही कारण है आज विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत होते हुए भी एक आवाज देते ही सब एक प्रतीत होते हैं । जन्म दिन हो अथवा कोई अन्य विशेष कार्य/अवसर सदैव आपस में तालमेल देखते ही बनता है ।

मनमोहन

          आज पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव भारतीय सभ्यता पर पड़ रहा है । एक समय था जब परिवार शब्द में एक विस्तृत स्वरूप होता था । सब एकजुट हो संगठित रूप से कार्य करते थे । आज बड़ी तेजी से परिवारों का विखंडन होता जा रहा है । परिवार का स्वरूप अति सूक्ष्म हो गया है । इस पर अपने विचार रखें–––––

दादा जी

          मेरी दृष्टि में इन सबका मूल कारण ‘स्वार्थ’ है । स्वार्थ–लालच का मानव मस्तिष्क पर इतना बोल–बाला हो गया है कि पहलेµ‘हम’ में पूरा परिवार समाहित होता था । परन्तु आज ‘मैं’ का प्रचलन बढ़ा है और इस ‘मैं’ ने ‘हम’ का स्वरूप सूक्ष्म कर दिया । परिणामस्वरूप परिवारों का विखण्डन होता जा रहा है ।

मनमोहन

          पूज्य दादाजी इन सबके लिए आप किन परिस्थितियों को उत्तरदायी मानते हैं  ?

दादा जी

          मेरी समझ में आर्थिक तंगी इसका मुख्य कारण हो सकता है । व्यर्थ मोह, प्रतिस्पर्धा  का गलत स्वरूप । जिसमें दूसरे से आगे निकलने की होड़ में व्यक्ति कुछ भी करने को तैयार हो जाता है । जबकि हम भली भांति परिचित है कि एक सफल व्यक्तित्व का मुख्य आदर्श होता है कि प्रतिस्पर्धा दूसरों से नहीं अपने आप से करनी है । आप कल जिस स्तर पर थे आज उससे आगे तथा भविष्य में उससे आगे निकलने का प्रयास करेंगे ।

          अब लौ नसानी, अब ना ––––––––

मनमोहन

          सर्वप्रथम हम त्रिपाठी साहब आपको साधुवाद  प्रेषित करते हैं । आपने बच्चों को सुसंस्कारित किया तथा सबको एक सूत्र में पिरोकर रखा । तथा आपसे निवेदन है कृपया आप हमारे समस्त पाठकों को अपनी कार्यशैली व विचारों से अवगत कराने की कृपा करें, जिनके मा/यम से यह सब सम्भव हो सका–––––  ?

दादा जी

          देखिए बेटे ! मैंने अपने घर में ‘राऊंड (गोलाकार) डाईनिंग टेबल’ रखी है । मेरा मानना था कि जब ‘रेक्टेंगिल (आयताकार) की टेबल होती है तब बैठने में प्रत्येक अपनी–अपनी सुविधा  देखता है तथा उसमें कोई व्यक्ति निकट तथा कोई दूर बैठता है परन्तु गोलाकार टेबल में प्रत्येक बराबर दूरी–बराबर क्षेत्र लिए एक दूसरे के सम्मुख रहता है । और यही बराबरी का अहसास उन्हें अपने अभिभावकों के बराबर निकट रखता है ? और मनमोहन बेटा यह प्रभु कृपा है कि बराबर प्यार और आदर मुझे आज भी प्राप्त है ।

          अभी आपने देखा कि मेरी बहू (मिसेज़ श्रीहर्ष त्रिपाठी) ने किस प्रकार स्नेहपूर्वक मेरे कपड़े ठीक किए और मुझे ‘टाई’ पहनाई । यह एक आदर्श बहू ही कर सकती है । इसके अलावा मैंने अपने जीवन निष्कर्ष को अपने बच्चों को बार–बार बताया है कि सदैव आज पर केन्द्रित  रहेंµआज को सुन्दर बनाएँ । क्योंकि जो कल बीत गया वो आपके बस में नहीं था और आने वाला कल अभी सामने नहीं है । आप आज को सुन्दर बना लेते हैं तो कल स्वत: ही आनन्दप्रद हो जाएगा ।

          साथ ही सदैव बालकों को धार्मिक  पुस्तकें/ग्रन्थ पढ़ने और उन्हें समझने को प्रेरित किया । विवेकशील होकर निर्णय लेने को प्रेरित किया । इस संदर्भ में मेरा प्रिय है — रामायण में किश्किन्धाकंद  

मनमोहन – 

त्रिपाठी साहेब ! बदलते परिवेश में अर्थ प्रबंधन  युग के चलते बड़ी पीड़ा पहुंचती है जब हम आए दिन जानते हैं — अमुक बालक/बालकों ने अर्थ (रुपये/पैसों) के कारण माता–पिता को अत्यधिक  पीड़ा पहुंचाई अथवा जान से मार दिया । इन सब परिस्थितियों के पनपने के पीछे आप किन बातों को विशेष रूप से मुख्य कारण के रूप में मानते हैं । कृपया विस्तार से बताएँ–

          माफ कीजिएगा ! दादाजी आपको बीच में रोक रहा हूँ । इन सबसे संबंधित पिछले पखवाड़े में दो प्रमुख घटनाओं के विषय में स्मरण दिलाता हूँ जिन्हें मैं आपसे तथा पाठकों से बाँट रहा हूँ ।

          एक — एक व्यक्ति के घर बालक का जन्म होने से पूर्व ही अथवा जन्म होने पर मृत्यु को प्राप्त हो जाता था । उसने इन सब बातों के पीछे माँ–बाप द्वारा टोना टोटका को जिम्मेवार मानते हुए दोनों को मृत्यु के घाट उतार दिया ।  दो — दूसरी परिस्थिति भी कम भयानक नहीं है जिसमें 85 वर्षीय बूढ़ी माँ को उसके पति के मरने के बाद बच्चों के आश्रित हो अपने बेटों के यहां बारी–बारी रहने जाती । और चहुँ ओर दो वक्त की रोटी के लिए सुबह से शाम तक कार्य करना पड़ता । ताने सुनने पड़ते और कलयुगी बहुओं के हाथों मार–पिटाई भी सहन करनी पड़ती । पृथक–पृथक बेटे–बहु के हाथों पिटने के बजाए उसने मन बना लिया कि एक ही बेटे के पास क्यों न रहूँ । परिणाम तो वही रहेगा ।

          त्रिपाठी साहेब सर्वप्रर्थम पत्रिका परिवार की ओर से हम ऐसे आताताईयों के विरुद्ध इस घृणित स्वरूप की निन्दा करते हैं । कृपया आप इन सब परिस्थितियों के लिए बालकों अथवा स्वयं अभिभावकों को किस हद तक जिम्मेवार मानते हैं तथा आपकी दृष्टि में इन सब परिस्थितियों से बचने के लिए बालकों व अभिभावकों को क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिएँ––– ?

दादा जी —   और अधिक  पाने की इच्छा, मार्ग कोई भी हो–––लालच । इन सब स्थिति के पनपने के पीछे मेरी सोच के अनुसार माँ–बाप स्वयं जिम्मेवार हैं । समस्या जब आए उसका सामना करें–उससे भागें नहीं ।

          ऐसी विकट स्थिति का सामना किसी को कभी–भी न करना पड़े उसके लिए प्रारंभ से ही अच्छे संस्कारों/आदर्शों का बीजारोपण करना चाहिए । बच्चों को अच्छे कार्यों के लिए शाबाशी दें । उनकी पीठे ठोकें और उन्हें ब्वदपिकमदबम में लेकर उन्हें अवगत कराएँ कि आप समर्थ हैं सबकुछ करने के लिए । आवश्यकता है लक्ष्य निर्धारण  करने की और एकाग्रता तथा तन्मयता के साथ लक्ष्यप्राप्ति की जिज्ञासा की । तब आप पायेंगे वे बालक न सिर्फ आपके परिवार के लिए अपितु समाज व राष्ट्र निर्माण में भी अपनी सही भूमिका निभाएँगें ।

मनमोहन — (प्रश्न )

अन्त में पूज्य दादाजी आपके आदर्शोन्मुखी जीवन के पीछे किन मुख्य विचारों–आदर्शों का बीजारोपण मानते हैं जिनके चलते आज 8–5 दशक बाद भी आप एक बालक के रूप मेंµपिता के रूप मेंµअच्छे नागरिक के रूप में सफल रहे हैं ।––––

          साथ ही पाठकों के लिए कोई सन्देश !

दादा जी–    मैं सदैव आज के विषय में सोचता हूँ । उसको जितना हो सके सुन्दर बनाने का प्रयास करता हूँ । परोपकार करने का यत्न करता हूँ । कहा भी गया है µ ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई’

          इस सदंर्भ में मैं एक संस्मरण आपको बताता हूँ µ

          मेरे पुत्र अमिताभ त्रिपाठी ने एक विदेशी लड़की को पसन्द किया और वे दोनों विवाह करने के लिए सहमत हो गए । लड़की ने अपने माता–पिता से बात की । उन्होंने अमिताभ के विषय में स्वीकृति दे दी परन्तु उन्होंने कहा विवाह दो व्यक्तियों का ही गठबंधन  नहीं है वरन् दो परिवारों का भी मिलन होता है । मैं इनके पिता से मिलना चाहता हूँ । उनसे मिलने के बाद उन्होंने तुरन्त स्वीकृति दे दी । मुझे विश्वास हो गया कि अच्छे   संस्कार राष्ट्रों की सीमाओं से नहीं बंधते , वे सर्वत्र स्वप्रकाशित होते हैं ।

मनमोहन

 दादाजी हम किस प्रकार से पत्रिका की ओर से आपको धन्यवाद दें । शब्द नहीं है । आपका आशीर्वाद हमें निरन्तर चाहिए ।

          चरण स्पर्श करके साक्षात्कार चाय के साथ समाप्त हुआ । इस अवसर पर मुख्य संरक्षक, दादा जी के वरिष्ठ पुत्र श्रीहर्ष उनकी पत्नी श्रीमती लता, उनका छोटा पुत्र व उसकी पत्नी उपस्थित थीं ।

Author: admin

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