‘जीने की जिजीविषा’

दिखाई पड़ती है

झलक कुछ हल्की सी

उम्मीदों से भरी टोकरी की

वही झलक हौले से हवा दे जाती है

जज़्बातों की रोशनी को

जैसे किसी खिड़की की हल्की सी

झीरी से झांकती है रोशनी

खिड़की पूरी खुल जाती है

हौसलों की हवा से

मंज़िल पाने की चाहत में

हौसलों की रोशनी जज़्बातों में भर

जीने की जिजीविषा फ़िर से

खड़ी हो जाती है

नये रास्तों का सृजन करती हूँ

हौसलों का दम भर फ़िर से चलती हूँ

गिरती हूँ,पर गिरकर फ़िर संभलती हूँ

कई बार सपनें टूटते हैं

उनके टूटे हुए टुकडों को समेटती हूँ

किसी टूटे हुए दिल के टुकडों की तरह

फ़िर से उन सपनों को मैं बुनती हूँ

उनमें फिर से नया रंग भरती हूँ

नई उमंग,नये उत्साह ,नये जोश का

अंतस में जीने की ज्वाला फ़िर से धधकने लगती है

जीने की जिजीविषा फ़िर से खड़ी हो जाती है

हाँ ये सच है जीने की अदम्य जिजीविषा है मुझमें…… priyamvada ‘पीहू ‘( वंदना)

Author: admin

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