लघुकथा :- दलित कन्या

रघु… आज नवरात्रि का नौवाँ दिन है और कन्या पूजन करना है । जा… आस पड़ोस की सारी कन्याओं को कन्या जीमने का न्यौता दे आ … । रघु की माँ प्रभा ने रघु से कहा …….…

माँ……… मैं अभी आता हूँ… कन्या जीमने का न्यौता देकर ….कहते हुए रघु चल दिया……

कुछ समय बाद सभी कन्याओं आ पहुँची ।

रघु की माँ ने सभी कन्याओं के चरण प्रक्षालन कर आसन पर बैठा दिया । तथा कन्याओं का लाल चुनरी ओढा कर तिलक लगाकर पूजन किया ।

अब कन्याओं को जीमने के लिए रघु ने सभी कन्याओं को भोजन के लिए थाली परोसने लगा ।

थाली देते हुए कुछ आगे बढ़ा तभी रघु की माँ ने रघु को टोका ।

रघु रूक ! उस लड़की को थाली मत दे …..

रघु अचम्भित होकर प्रभा की ओर देखने लगा ।

तभी प्रभा बोली ….. क्यों मीनी तू घर से थाली ग्लास क्यों नहीं लाई…..

तुझे पता है कि तुम दलित किसी के घर दूसरेे बर्तनों में भोजन नहीं करते ………

माँ की बात सुनकर रघु बोला….

माँ…….तुम भी रूढ़ीवादी बातों को मानती हो…… क्या दलित कन्याऐ पूज्यनीय नहीं होती है । अभी आपने उसके चरण धोकर चरणोदक लिया और अब सिर्फ बर्तनों में भोजन करने से बर्तन अशुध्द हो जाते है । और चरणोदक को लेने पर मुख शुध्द रहता ……

माँ दलित की कन्याओं में देवी अंश नहीं होता सिर्फ कन्या जीमाने का यह कैसा आडम्बर ……..

क्या इस व्यवहार माँ दुर्गा प्रसन्न होंगी …….. नहीं…….. कभी नहीं……

लेखक :- निहाल छीपा “नवल”

गाडरवारा म.प्र.

Author: admin

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