हूटर

मुझे  फैक्ट्री के सारे मुलाजिम हमेशा ही फैक्ट्री में बजने बाले हूटर के गुलाम सरीखे दिखते थे ।हालांकि ये सब नियम से नहाते-धोते ,खाते-पीते थे , लेकिन इनके  जीवन में स्फूर्ति न थी ।

एक यन्त्रवत जीवन यापन था।एक अनकही यन्त्रणा थी।

         सबेरे पांच बजे के हूटर पर मन हो या न हो बिस्तर छोड देना। सात बजे के हूटर पर टिफिन का झोला साइकिल में लगाये , साढे सात के हूटर पर फैक्ट्री गेट के अन्दर आई कर्ड पंच करने से लेकर , इस कैद खाने से छूटने की शाम सात बजे तक के हूटर की थका देने बाली अविराम प्रतीक्षा , फैक्ट्री में काम करने बाले हर कर्मचारी के हिस्से की दिनचर्या थी।

             नापसंदगी ही कभी-कभी जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है ।

शादी के बाद मेरा जीवन भी हूटराधीन था।

“हूटर के दास पति की दासी अर्थात दासनुदासी।”

         एक दिन हूटर की आबाज पर वह उठा , उस दिन उसका चेहरा जल्दी में नहीं लग रहा था , हां कुछ-कुछ चोर निगाहों से मुझे जरूर देख रहा था।

            मैने टिफिन दिया ।उसने टिफिन लेते हुये अपनी अंगुली मुझसे न छू जाये इसका भरसक प्रयत्न किया।

     मैने नोटिस किया , लेकिन किसी अशुभ विचार से कहीं “पल्ला न छू जाये इस डर से पल्ला झाड लिया।”

        वह किसी स्वामिनी का हाथ पकड़े इस हूटर की परिधि से कहीं बाहर चला गया था ।

और मैं , दासानुदासी हूटर की गुलामी करती , आज भी सुबह के पांच बजे के हूटर पर बिस्तर छोडकर शाम के सात बजे के हूटर पर दरबाजे की कुन्डी खोल हर आहट पर ऐसे कान लगाये रहती हूं जैसे पूरे शरीर में कान ही कान उग आये हो।

लेकिन सुनाई पडती है तो ,केवल सात, सवा सात, साढे सात के हूटर की आवाज।  जो रोज मुझे हूट करती है , और मैं इसका कुछ नहीं कर पाती ।

डाॅ सन्ध्या तिवारी

  पीलीभीत

Author: admin

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