ग़ज़ल

दिल से गर आह  निकलती  है निकल  जाने दे।

कैसे  भी  गम  की  ये  चट्टान  पिघल  जाने  दे।

ज़िंदगी से हटा  ले गम को  कुछेक पल के लिए,

मेरे  इस  दिल  को  जरा  सा  तो  बहल जाने दे।

मैंने    माँगी   हैं   अपनी    मुस्कुराहटें   जिससे,

वो  कह  रहा  है   जरा  वक़्त   बदल  जाने   दे।

अपनेपन का भरम जिनसे था वो अब टूट गया,

जिंदगी  से  भी  उन  लोगों  को निकल जाने दे।

बहुत   तकलीफ़   दे   रहीं   हैं   तुम्हारी    यादें,

मुझे,  पुरानी   जिंदगी  से  दूर  निकल  जाने दे।

“अकेला” तू  तो  उसके  साथ  बैठ  जाया  कर,

जलने बालों को जितना जलना है जल जाने दे।

       पोषराज ‘अकेला’

Author: admin

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