” माँ की ममता “

संसार मे रिश्ते -नातो के प्रेम से  ज्यादा शक्तिशाली स्थान है ” माँ की ममता का” जो  महान और पवित्र है । जिसे एक माँ ही अपनी संतान को दे सकती है इस लिए मानव जीवन में माँ को “मात्र देवोभव ‘ का स्थान दिया गया है !

माँ के ह्रदये की पावनता तथा आशीष की शक्ति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता !स्वामी विवेकानंद जी  जेसे महान संत को माँ काली की कृपा  से विश्व भर में ख्याति प्राप्त हुई !

 ऐसे कितने ही और संत व्  महान पुरुष हुए जो मां से मिलने वाले संस्कारों को अपना कर मां को  अपना आदर्श बनाया व यशस्वी और सफल हुए ।

 माँ की प्रार्थनाओ में सदेव अपने बच्चो के लिए मंगल कानाएं ही  होती है !

 माँ का प्यार सर्वोत्तम है ! उसी प्रेम के कारण पवित्र भावनाओ का उदय होता है ! माँ की ममता निस्वार्थ होती है इस लिए कहा जाता है  की ..माँ के रहेते भगवान् को ढूँढने की आवश्यकता नहीं होती ! माँ का वात्सल्य प्रेम प्राप्त हो जाये तो ईश्वर कृपा स्वत :ही प्राप्त हो जाती है !

आज की पीढी  व समाज के बदलते परिवेश के चलते आज की दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति ही कही जायेगी की मानव इस देविक शक्ति से अनभिज्ञ हो माँ की ही नहीं  माँ- बाप  दोनों की ही  उपेक्षा कर रहा है !

” पूत कपूत सुने है जग में माता सुनी ना कुमाता ” यह पक्तियां काहीना कही आज सत्य प्रकट कर रही है कारण चाहे जो भी हो लेकिन संस्कारो को भूल अधिकतर लोग अपने जन्मदाताओ का अपमान कर रहें है !

माँ की ममता बेमिसाल है जिसकी तुलना कर पाना  संभव ही नहीं ! क्रांतिकारी संत के नाम से बिख्यात स्वर्गीय श्री “मुनि तरुण सागर” जी के कथन अनुसार  जीवन में तीन का होना परम आवश्यक है ..एक माँ ,दो महात्मा और तीन परमात्मा ! बचपन में माँ का प्रेम आशीर्वाद ,जवानी में महत्मा का और बुढ़ापे में परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त हो जाये तो जीवन सफल समझना चाहीये ! इन तीन की छात्र छाया सर पर रहें तो जीवन धरती पर ही स्वर्ग है !

एक समय था जब परिवार बड़े हुआ करते थे व परिवार में आठ -दस बच्चे  हुआ करते थे हमारे बहुत से बुजुर्ग आज भी कहते मिल जायेगे की हम सब आपस में ८ -१०  भी बहन थे और माँ बाप सभी का  समान पालन पोषण किया करते थे किसी को कोई शिकायत नहीं होती थी आज दो तीन बच्चे मिल कर भी माँ -बाप का पालन पोषण नहीं कर पाते !

माँ में भगवान के  तीनो रूप समाये है !

माँ जन्म देती है इस लिए माँ ब्रहमा का स्वरूप है , संतान का पालन करती है इसलिए विष्णु का रूप भी है ,माँ संतान को अच्छे संस्कारो से पोषित करती है इस कारण से उसे महेश भी कहा गया है ! जिस के आँचल की छाव में संसार के सरे दुःख -संताप मिट जाते हो उस माँ की ममता का गुणगान  चाँद शब्दों में समेटकर नहीं किया जा सकता !

माँ की कोई उपमा नहीं हो सकती क्यों की उपमा शब्द में माँ स्वयं उपस्थित है – उप ‘माँ ‘ उपमा की  भी माँ के बिन कोई उपमा नहीं ! माँ सिर्फ माँ है और ममता उसकी पहचान !जो बदले में चाहती है अपने घर परिवार ,संतान से  प्यार के दो बोल !

मंगला रस्तौगी  , दिल्ली

Author: admin

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