कुछ पल तो और दे दो

वो चींखती रही चिल्लाती रही

मुझे कुछ पल तो और जीने दो

माँ को अभी मैंने ठीक से देखा नहीं

ममता का रस इन आँखों से पीने दो

अभी तो माँ के कोमल हाथों ने छुआ नहीं

कतरा कतरा है सांसे मेरी, जन्म भी मेरा अभी हुआ नहीं

वो चींखती रही चिल्लाती रही

अभी तो मैंने आँखे खोली नहीं

पलकों में ख्वाब संजोए नहीं

अश्क भी आते नही मुझे पर कैसे कहुं मैं रोई नहीं !

कि माँ को मुझे अभी देखना है

प्यार भी करना है

दो पल दे दो मुझे

चाहे उसके बाद मरना है

कि ढेरों बातें करनी है उनसे अभी

रह ना जाये मेरे एहसास अनकही

क्या दो पल की भी इज़ाज़त नही

माँ के दिल में मेरे लिए इतनी भी चाहत नही

आहत हूँ मैं अपने लड़की होने से

मगर माँ तुझसे कोई शिकायत नहीं  

वो चींखती रही चिल्लाती रही

क्या एक सोच इतना मायना रखती है

की सही गलत भी तु समझी नहीं

ये समझी तो दिल की बात तूने कही नहीं

एक बात बता क्यों तु अपनी नन्ही परी के हक़ के लिए लड़ी नहीं !

                                                              डॉ रजनी यादव

Author: admin

8 thoughts on “कुछ पल तो और दे दो

  1. मर्मस्पर्शी, संवेदनाओं से भरी बहुत ही मार्मिक कविता।।

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