पता नहीं कब!

रितु गोयल

उफ्फ!!! ये दहशत भरी रात। पता नहीं कब बीतेगी? 

  बेटे को साथ चिपकाये दोनों पति पत्नी कमरे में अंधेरा कर के पलंग पर बैठे थे। बाहर आतंकियों के गोली चलाने की आवाज गूंज रही थी तो कभी किसी निर्दोष के कराहने की व चीखने की आवाज जैसे कानों को चीर रही थी।

     दो घंटे पहले शुरू हुआ ये बबाल तब से लगातार जारी था। यह कश्मीर का एक छोटा सा गांव था जिसकी गलियां कुछ देर में ही खून से नहा गयीं थी। उपद्रवियों को रोकने में सब प्रयास विफल हो रहे थे। 

‘कहीं हमारे घर में ही ना घुस जायें?’ डर के कारण अबू व उसकी पत्नी कांप रहे थे। कारण था। वहां रह रहे देशद्रोहियों का विरोध! जिनमें अबू हमेशा साथ रहता व देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करता। अब भी उसका डर अपने लिये नहीं, बेटे व पत्नी के लिये था जिन्हें वह अपने फर्ज पर कुर्बान नहीं कर सकता था। 

    पर हुआ वही जिसका डर था! दरवाजा खटखटाने की आवाज आयी। जाहिर था कुछ ही देर में दरवाजा टूट जाता। उसने पीछे के दरवाजे से पत्नी व बेटे को भगाना चाहा। बेटा नादान था पिता के इतना कहने पर कि ‘भाग जा यहां से दूर!’ वह भाग खड़ा हुआ। पर पत्नी ने हमेशा की तरह उसका साथ निभाया। चाहें जियें या मरें। साथ साथ…. दोनों कुर्बान हो गये देश पर।

     बेटा डर गया था। नासमझ था। उसे नहीं पता कि आतंकी क्या होते हैं? उसे तो ये भी नहीं पता कि वह अब अनाथ हो गया है। भागने लगा गलियों में यहां से वहां। उन सब से बचने के लिये, किसी महफूज जगह की तलाश में। पता नहीं वो महफूज जगह उसे कहां मिलेगी? और कब खत्म होगा इन दहशत फैलाते हाथों का आंतक? पता नहीं कब?

Author: admin

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