गरमी

गरमी
की गर्महवा,
ले बह उठी पछुआ,
कानो में लू सनसनाई!
धूल सने पगडंडी
चिटचिटाते पैर
जल उठे घांस
बसवारी में
आग चटचटाई!!

महुआरी
बैरकंठी
सरना के छांव;
घाम से तीपरहे
पंछी के ठांव;
पतझड़ के झरे पात
नवनिहाल नया खेप
कोमल कलेवर
रक्तिम हरित आभ;
विह्वल हैं आतप से
कुम्हलाये झुलस गये ढ़ाक!!

तीर की तीक्ष्णता से
बींध गये आखेट,
आखेटक मरीचिका
उष्मित तृषाबूंद स्वॆद;
संकर्षण प्राण
होरहा मृयमाण
बरगदविशाल वातायन में
सिमट सोई दुपहरी;
कर रहॆ
कलरव गान पंछी
गाय बैल बकरियां जुगाली!!

चरवाहे खेल रहे गादी-तास
मुसाफिर सानरहा सत्तू;
गुड़पानी सोखरहा
जठराग्नि का लू!
पास ही इनार पर
डगर रहा घड़ारी;
बैल-मोट खींच रहे
प्यास और पानी!!

लोटाऔर डोर
उलीच रहे कुंआ
गरमी को सोखने;
लपेट लपट पगड़ी
सूरज आ बैठा सिरहाने!
धरती आकाश बेहाल
सिमट गया जीवन
खपरैल के घरोंदे में;
सूराख से छन छन कर
ताक झांक करतीं
सूरज की आंखें !!

खिड़की की टाट हटा
रह रह आती अमरइया की हवा ;
झलता पंखा सूखता पसीना
लतपथ करवटें, लगती नींद कहां?

चंगला,बावनपरी,लुडो,व्यापार
खेल खेल घर बैठे ऊबते;
शाम का इंतजार
ट्यूबवेल के टंकी में तैरते डूबते;
या फिर आम के बगीचे मे
खाट पर बैठ दुपहरी बिताओ;
सत्तू और आम की चटनी खाओ,
दौड़ दौड़ गिरे आम
बिनकर ले आओ!!

श्रीफल का रस,
बतासा या गुड़पानी;
या पना आम का ,
सत्तू का घोल
मां बना लाती !
हंस कर,डांट कर
खिलाती-पिलाती थी;
गांव की बतास भरी
गरमी की दोपहरी कट जाती थी!!

-अंजनीकुमार’सुधाकर’

Author: admin

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