आँसू तो सच्चे थे

विनय कुमार पाठक

“दीदी! तुम उस बुढ़िया की बीमारी पर इतना कैसे रो रही थी? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि कैसे तूमने इतने आँसू बहाए| कुछ भी हो तुम्हारी सास के साथ तुम्हारा जो रिश्ता रहा है उसके अनुसार तुम्हारा रोना मेरे समझ में नहीं आया”-  बलराम अपनी दीदी से पूछ रहा था|

“ऐसा मत बोलो बलराम, मेरे आँसू बिल्कुल सच्चे थे” – सुभद्रा ने कहा| उसकी आवाज में कुछ शोखपना था, चेहरे पर चपल मुस्कान|

वस्तुतः सुभद्रा की सास को दिल का दौरा पड़ा था और आनन फानन में उसे अस्पताल में भर्ती किया गया था| सी सी यू के बाहर कई रिश्तेदार थे जिनमें एक सुभद्रा भी थी और बलराम भी| एक एक कर सभी रिश्तेदार छँटते चले गये थे| बाहर प्रतीक्षा लाउंज में सिर्फ भाई बहन ही बचे थे| शेष लोग कुछ कुछ काम से इधर उधर जा चुके थे|

”पर तुम्हारी तो अपनी सास से पिछले कई वर्षों से बोलचाल भी नहीं है फिर एकाएक उसके लिए इतना दर्द कैसे?”- बलराम ने पूछा|

“मैं कब कह रही हूँ कि मेरे दिल में उसके लिए दर्द है| मैं तो सोच रही थी कि अगर बुढ़िया मर-मरा गई तो मेरा अपने प्यारे बेटे को एडमिशन के लिए दिल्ली जाने का कार्यक्रम गड़बड़ा न जाए| मेरी आँखों में आँसू तो इस दुःख में बह रहे थे कि बुढ़िया को मरना ही है तो इसी समय में|”

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