मुट्ठी भर अनुराग से खेलें अब के फाग

मैं और तुम,अब हम के रँग से खेलें फाग

बुझा डालें हर हृदय से, नफरत की आग

बिखरा दें हर जहन पर, मुट्ठी भर अनुराग

सारा माहौल फाग के रँग से रँगा हुआ है, तो क्यूँ न हम भी शाश्वत अनुराग के रँग से फाग खेलें।

वैश्विक बँधुत्व का इरादा ही वास्तविक फाग का आनँद ले सकता है।माना कि हम सेना में भर्ती नहीं हुए, मगर सेनानी तो हो ही सकते हैं।देश की सीमा पर बिखरी अलगाववादी चिंगारियों को शीतल प्रेम की बौछार से सराबोर करने का प्रयास तो व्यक्तिगत स्तर पर किया ही जा सकता है।

नश्वर दौलत के लिए आपस में न लड़ें

निस्वार्थ प्यार से नित नए आयाम गढ़ें

भारतीय सँस्कृति वैश्विक स्तर पर अपने मानव मूल्यों के कारण पहचानी जाती है।आधुनिकता की अँधी दौड़ ने आज हर स्तर पर, हर वर्ग में, हर क्षेत्र में, समृद्धि की परिभाषा को ही बदलने की तमाम कोशिशें की हैं,लेकिन हमारी सँस्कृति में रची बसी पावन विद्वता ने इन सभी कोशिशों को अपनी दिव्यता से सदा ही नाकाम किया है।

नादानी में मत खोना-हृदय के रेशमी उदगार

गणित जीवन का-चँद साँसें+निस्वार्थ प्यार

आज मानव की पहुँच चाँद तक है। स्पेस तक जाकर कई कीर्तिमान गढ़े गए हैं। इक्कीसवीं सदी का उच्च शिक्षित

मानव इतना समर्थ हो चुका है कि पलक झपकते ही सात समँदर पार का फ़ासला तय करने लगा है। मानव कहीं भी जाए, मगर उसकी भूख-प्यास सदा एक सी ही रहती है।

पूरब हो या पश्चिम, हर जगह, हर उम्र के, गृहस्वामी-बेघर,

अमीर-ग़रीब, श्वेत वर्ण-श्याम वर्ण, हिंदु, मुस्लिम, सिख, इसाई, सभी लोग केवल एक ही चीज़ की तलाश में हैं, और वो चीज़ है प्यार।

प्यार पर अनेक ग्रँथ लिखे गए, अनेक कहानियों ने जन्म लिया, कई स्मारक बने, यहाँ तक कि इतिहास भी आज तक आम्रपाली और अनारकली के अमर प्रेम का गवाह रहा है।

लेकिन आज जब कि समूचा देश अलगाववाद की चिंगारी से सुलग रहा है, क्यूँ न अपनी अँतरात्मा से ही वैश्विक बँधुत्व की शुरूआत की जाए।

काश,ऐसा कोई पूजा स्थल बनाए सरकार

जिसमें प्रवेश कर सके, इँसान का किरदार

अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए प्रेमी बन कर जग को लुभाना बहुत आसान है, लेकिन प्रेम करने में और प्रेम बन जाने में बहुत बड़ा अँतर है।प्रेमी अँबर से चाँद चुरा लाने के दावे किया करते हैं और प्रेम स्वँय गगन के चाँद में रूपाँतरित हो जाता है।

मिट जाती है बनने से पहले ही,हवाओं पे लिखी हर लकीर

है अनश्वर इस जग में, निस्वार्थता और शाश्वत प्रेम अधीर

छोड़ें झूठे दँभ, जाएँ खाली हाथ ही क्या राजा क्या फ़क़ीर

प्रेम बन, बाँटें प्रेम, करें तन को राँझा और इस रूह को हीर

Author: admin

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