मज़दूर दिवस की समूचे विश्व को बधाई क़लम से गुँजित करें हर दिल में शहनाई

कविता मल्होत्रा

मजदूर वर्ग समाज का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग होता है उन्हे यथोचित सम्मान देना प्रत्येक ज़िम्मेदार नागरिक का फर्ज़ है। मजदूर दिवस उस श्रमिक वर्ग को समर्पित है जो अपना खून-पसीना बहा कर अथक परिश्रम कर के देश की प्रगति में अपना अमूल्य योगदान देते हैं।

विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस “1 मई” के दिन मनाया जाता है। किसी भी देश की तरक्की उस देश के किसानों तथा श्रमिक वर्ग पर निर्भर होती है। एक मकान को खड़ा करने और सहारा देने के लिये जिस तरह मजबूत “नीव” की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, ठीक वैसे ही किसी समाज, देश, उद्योग, संस्था, व्यवसाय को खड़ा करने के लिये कर्मचारीयों की विशेष भूमिका होती है।

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समूचे वतन में खुशहाली हो

ग़र हर दिल में हरियाली हो

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लेबर डे पर क्यूँ न वास्तविक लेबर से सब की पहचान करवाई जाए। यूँ तो सारे साल में से एक गिन लेबर के नाम करके समाज में लेबर को सम्मानित किया जाता है, लेकिन वास्तव में लेबर को हर मौसम में निरँतर काम करने वाली मशीन से अधिक कुछ नहीं समझा जाता। कई जगह कार्यकर्ताओं को उनका उचित मेहनताना न देकर शोषण किया जाता है, तो कई जगह कम मेहनताने पर ज्यादा काम लिया जाता है। कहीं पेड़ों की ठँडी छाया में आराम कर रहे बँधुआ मज़दूरों को कुछ आलसी और बिगड़ैल रईस अपनी वातानुकूलित कारों से कुचल कर भी जुर्म के इल्ज़ाम से रिहा कर दिया जाते हैं, तो कहीं ताजमहल बनाने वाले कुशल कारीगरों की तरह उनके हाथ काट दिए जाते हैं, ताकि शोषक वर्ग मज़दूर की मेहनत पर अपने स्वामित्व का ठप्पा लगा सके। यूँ तो हर इँसान गल्तियों का पुतला है, लेकिन यदि लेबर से कोई गल्ती हो जाए तो अपने रूतबे का इस्तेमाल करके शोषक वर्ग लेबर को अपमानित कर के बेवजह सज़ा दिलाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता। इँसान के रूप में शैतान जब प्रकृति के सँसाधनों से छेड़छाड़ करते हैं तो क्रोधित हो कर प्रकृति कई प्रकार की आपदाओं से अपना रोष प्रकट करती है।

यदि मानव अपने जन्म का वास्तविक उद्देश्य समझ जाए तो न तो वो प्रकृति के साधनों से ही छेड़छाड़ कर और न ही प्रकृति के साधकों की राह में कोई बाधा पहुँचाने की ज़ुर्रत करे।

चँद साँसों का उपहार केवल बाँटने के लिए मिला है तो क्यूँ ना निस्वार्थ प्रेम बाँटा जाए ताकि अपने साथ साथ समूचे जगत को हरियाली प्रदान करके प्रकृति के ऋण से मुक्त हुआ जा सके।

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सामँजस्य बैठाओ तो आनँदित करे प्राकृति का सुरूर

भीषण ऊष्ण लहर का प्रभाव जाने दिहाड़ी का मज़दूर

वातानुकूलित कक्षों में पसरे प्राणी बेवजह होते मग़रूर

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ईश्वर ने सारी सृष्टि में पलने वाली जीवात्माओं को एक समान रक्त मास दे कर गढ़ा है। जो जीव जिस स्थान पर जन्म पाता है, उस स्थान की जलवायु और फ़सलों के खान पान के प्रभाव से उसकी चमड़ी का रँग रूप आकार पाता है।क्षेत्रीय बोलचाल की भाषा उसके विचारों के आदान प्रदान का माध्यम बनती है।पारिवारिक मान्यताएँ और सामाजिक परँपराएँ प्रत्येक जीवात्मा का व्यक्तित्व गढ़तीं हैं।

ये सारी व्यवस्था प्रकृति की है जो समस्त ब्रह्माण्ड को निस्वार्थ प्रेम का क़ायदा अपनी नित नियमबद्धता से पढ़ाती है।

स्वँय को ऊँचा साबित करने के लिए दूसरों को नीचा दिखाने की पाश्विक प्रवृत्ति मानवता का हनन करती है।

ये प्राणी मात्र पर निर्भर करता है कि वो प्रकृति प्रदत्त जीवन को अपने स्वार्थ की नज़र से देखे या पग पग पर बिखरे प्राकृतिक निस्वार्थता के नज़रिए से।

प्रकृति से जुड़ कर अपनी सही पहचान पाएँ

भीतर से चमकें बाहरी रोशनियों को ठुकराएँ

Author: admin

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