सर्व समाज सुधारक डाo अम्बेडकर

आज के भारत मे जो तथाकथित जाति के ठेकेदार खुद को दलित कह डाo अम्बेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेक रहे उन्हें समाज का मैल कहने मे मुझे तनिक भी संकोच नही । अभी हाल ही मे यू पी के करोड़पति और बनावटी दलित नेताओ ने अपनी विरासत अपने करोड़पति भाई भतीजे को सौपने का ऐलान किया है । मैं उन गरीब दलितों से सीधे तौर पर पूछना चाह रहा की आप जो कई वर्षो से एक कार्यकर्ता की तरह संघर्ष करके बसपा सपा आदि के जिला सचिव या अन्य पदों पर आज भी काम करके गरीब दलित ही है उन्हें ये राजनीतिक विरासत क्यों नही मिली ? अब फैक्ट समझिये कि
महाराष्ट्र में जन्मे डॉ भीमराव रामजी एक समाज सुधारक हुए । वे इतने मेधावी थे कि उनके गुरु ने अपना गोत्र नाम अम्बेडकर दे दिया और आज वे डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर हो गए इतने प्रतिभा संपन्न थे कि उनकी शिक्षा लन्दन में हो, बड़ोदरा राजा ने उन्हे छात्रवृति दिया और वे अपने गुरु के आशीर्वाद और वड़ोदरा राज़ की सहायता से भारत ही नहीं विश्व के ख्याति नाम चिंतक हो गए, वे विचारक थे भारत के दबे कुचले समाज के बारे में करुणा थी, उन्होंने कहा कि वैदिक काल में छुवा -छूत, भेद -भाव नहीं था ये इस्लामिक काल की देंन है । डा अम्बेडकर ने कहा “हम मुसलमानों के साथ नहीं जा सकते मुसलमानों का भाई चारा केवल मुसलमानों के लिए है न की अन्य समाज के लिए” वे हमारे सीधे- साधे समाज को निगल जायेंगे हमारी परंपरा संस्कृति समाप्त हो जाएगी, हमारे वैदिक वांग्मय में छुवा छूत, भेद-भाव नहीं था ये इस्लामिक काल की देंन है हम इसी समाज में रहकर इसे दूर करेगे उन्होंने कहा वेदों में जिन शुद्र का वर्णन है वे आज के शुद्र नहीं आज के शुद्र इस्लाम की देन है, भारतीय दर्शन की ही देन है कि दलित समाज में जाग्रति आयी है वे चौतरफा उन्नति कर रहे हैं वे उन सभी सुख सुबिधाओं का उपयोग कर रहे हैं जिसे तथा कथित सवर्ण समाज कर रहा है हिन्दू समाज में भेद- भाव लगभग समाप्त सा हो गया है हाँ अभी गांव इससे उबर नहीं पा रहे हैं लेकिन उन्होंने राह पकड़ ली है हाँ कुछ राजनैतिक दल इसमे वाधा आज भी बने हुए हैं जिन्होंने ६०-६५ वर्षों तक शासन किया है वे इसके लिए जिम्मेदार हैं, जो दलितों के बारे में अधिक सहानुभूति दिखाते हैं जैसे वामपंथी दल, समाजवादी और बसपा जो केवल बोलते है इनके लिए कुछ करते नहीं, क्या इन लोगो ने दलितों की उन्नति और विकास के लिए कुछ किया तो इसका उत्तर एक ही है कि कुछ भी नहीं–? कहीं दलित मुस्लिम एकता के नाम पर इन्हे देश विरोधी ताकतों के साथ जोड़ने का प्रयास तो नहीं !
भारत तेरे टुकड़े होंगे “इंशा अल्ला- इंशा अल्ला” का नारा लगाने वाले इस्लामवादी और वामपंथी दलित मुद्दों को हाईजैक कर कुछ दूसरा ही जामा पहनाने का प्रयत्न कर रहे हैं कई अतिवादी संगठन दलितों को हिन्दूवाद से बचाने के नाम पर भारत के खिलाफ जंग को भी न्यायसंगत बताने लगे हैं, इसी तरह ‘चर्च तत्व’ दलितों के खिलाफ होने वाले भेद-भाव के नाम पर भारत पर प्रतिवन्ध लगाने की पश्चिमी देशों मे मांग करते हैं इनसे सावधान रहने और इन्हे पहचानने की जरूरत है।
इसके उलट जिसे दलित विरोधी सिद्ध किया जा रहा है (आरएसएस) इन्ही दलित, जन जातियों के बीच एक लाख से अधिक सेवा कार्य करता है जिसमे शिक्षा, संस्कार और स्वस्थ द्वारा उनके उन्नति व बराबरी का मार्ग प्रसस्त होता दिख रहा है, इस कारण केवल भाषण नहीं तो ब्यवहार के द्वारा होना चाहिए, जहां देश के विकाश मे दलितों की सहभागिता है वहीं समाज मे समरसता हेतु लंबे संघर्ष का इतिहास भी है, आखिर वैदिक ऋषि दीर्घतमा, कवश एलुष, महर्षि वाल्मीकि, महिदास एतरेय, संत रविदास, संत कबीर दास और डा अंबेडकर, वावू जगजीवन राम ने संघर्ष कर समाज मे उच्च स्थान प्राप्त किया उसका सिद्धान्त क्या था ?”दलित मुस्लिम भाई-भाई हिन्दू जाती कहाँ से आयी”- “इस्लाम जिंदावाद, अंबेडकर जिंदवाद” के पोस्टर लगाने वाले संगठन क्या इस्लाम और मुस्लिम राजनीति को लेकर अंबेडकर की लेखनी पर अपना विचार स्पष्ट करेंगे–! अगर दलित संगठन यह मानते हैं कि अंबेडकर द्वारा दिखाये गए “धम्म मार्ग” भारत के लिए उचित है तो वे कभी इसे लेकर मुस्लिम समाज मे क्यों नहीं गए ? अंबेडकर ने स्पष्ट लिखा है कि इस्लाम ने ही भारत वर्ष से “बौद्ध धर्म” का सम्पूर्ण विनाश किया था मध्य काल मे इस्लामी हमलों ने बड़े पैमाने पर “बौद्ध मठों” और “विहारों” का विध्वंश किया और बौद्ध जनता का जबरन धर्मांतरण भी, क्या उनकी ओर से यह बताया जायगा कि भारत के विभाजन पर अंबेडकर, सावरकर और आरएसएस के विचारों मे एक समानता थी ।दरअसल दलित-मुस्लिम एकता की पुरी राजनीति ही अंबेडकर के “प्रबुद्ध भारत” की कल्पना के विरुद्ध है इसमे विदेशी और चर्च का षणयंत्र दिखाई देता है, ऐसे विचार डॉ अंबेडकर के विचारों का हनन भी है, क्या किसी पठान, शेख और सैयद के दरवाजे पर कोई छोटी जाती का मुसलमान बैठने को पाता है–! शिया को सुन्नी की मस्जिद मे जाने नहीं देता, तो बहाई को किसी शिया मस्जिद मे, इतना ही नहीं किसी भी पठान की मस्जिद मे कोई जुलाहा, धुनिया व अन्य मुसलमान जा सकता है क्या-? गया के अंदर एक ह्वाइट हाउस मस्जिद है जहां जो भूमिहार से मुसलमान हुए हैं वही जा सकते हैं, यह केवल ऊपर से दिखाई देने वाली बात है आज असली मुसलमान होने का युद्ध जारी है सभी असली खलीफा बनने के लिए आतंकवाद मे विश्व को झोकने को तैयार हैं वे दलितों के साथ क्या न्याय करेंगे-?
वास्तविकता यह है की ये दलित नहीं ये तो धर्म रक्षकों की संताने हैं यही बात बार-बार डा अंबेडकर ने कही है क्या उसे नजरंदाज किया जा सकता है–! कहीं ऐसा तो नहीं– “एक बार महात्मा गांधी ने अली वंधुओं से पूछा की हिन्दू मुस्लिम एकता कैसे हो सकती है तो आली वंधुओं ने उत्तर दिया जिस दिन सभी हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर लेंगे उसी दिन हिन्दू मुस्लिम एकता हो जाएगी”, ये सेकुलर प्रतिकृया वादी नेता कहीं दलित-मुस्लिम एकता के नाम पर उन्हे अपने पूर्वजों व अपनी संस्कृति से दूर तो नहीं करने चाहते, इस पर भी विचार करने की अवस्यकता है, आज नए-नए दलित चिंतक पैदा हो गए हैं जिनहे अपनी संस्कृति का ज्ञान नहीं है वे केवल प्रतिकृया मे हैं आज भूमंडलीकरण के दौर मे वह अपने मानवीय सम्मान के प्रति सजग और सचेत है किसी भी जातीय श्रेष्ठता को अस्वीकार करता है मध्यम मार्ग पर चलकर सभी मे मानवीय (हिन्दुत्व) संवेदना का आलंगन करने को आतुर है।
इस्लामिक हमले मे जो जातियाँ धर्म रक्षक थी वही काल के गाल मे समा गईं मंदिरों की रक्षा व पूजा का भार क्षत्रियों व पुरोहितों का था वे पराजित हुए उन्हे या तो “इस्लाम स्वीकार करो या मैला उठाओ” उन्होने धर्म वचाया वे मुस्लिम दरवार मे काम करते थे लेकिन उनका छुवा पानी भी नहीं पीते थे धीरे-धीरे वे अछूत हो गए उनका मान भंग हुआ भंगी कहलाए, संत रविदास “चमरशेन वंश” के राज़ा थे स्वामी रामानन्द के शिष्य सन्यासी थे दिल्ली शासक सिकंदर लोदी से संघर्ष मे पराजित लेकिन भारत मे सर्वमान्य साधू सर्वाधिक शिष्य थे इनके पास, सिकंदर लोदी ने सदन कसाई को रविदास के पास मुसलमान बनाने हेतु भेजा वे इस्लाम नहीं स्वीकार करने की सज़ा चांडाल घोषित उनके शिष्यों ने भी स्वयं को चांडाल घोषित कर लिया “चांडाल” का अपभ्रंश “चमार” हो गया धीरे-धीरे वे अछूत हो गए लेकिन धर्म नहीं छोड़ा, बिहार मे पासवान जाती के लोग हैं वे गहलोत क्षत्रिय हैं गयाजी के “विष्णुपाद मंदिर” की सुरक्षा हेतु ‘राणा लाखा’ के नेतृत्व मे आए थे यहीं वस गए मुसलमानों से सुरक्षित हेतु ‘सुवर’ पालना शुरू कर दिया । इसी परंपरा की रक्षा करते हुए संत रविदास तथा संत कबीरदास समाज को जागृत कर खड़ा किया। स्वामी दयानन्द सरस्वती की राह को आसान करते हुए डॉ भीमराव अंबेडकर ने सामाजिक विकृतियों को दूर करते देश के राष्ट्रिय चरित्र को उजागर किया, उन्होने कहा ”मै ईसाई और इस्लाम मे विश्वास नही रखता जबकि आज मायावती बिना इस्लाम के चल भी नही पा रही । इस्लाम की चाटुकारिता सीधे तौर पर अम्बेडकर जी की बेइज्जती है । आप यदि सही मायने मे दलित है तो मेरे इस लेख पर विचार अवश्य करे । पूरा लेख अम्बेडकर जीवनी से संकलित है तो तथ्य पूर्णतया सत्य और भारत की पुरातन संस्कृति को दिखा रहे । कृपया दौलत की बेटी व बेटो को दलित मान वोट देने से पहले सौ बार सोचे ।
—- पंकज कुमार मिश्रा जौनपुरी

Author: admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *