जागृति पर्व– डा. भीमराव अम्बेडकर जयन्ति (14 अप्रैल)

‘शिक्षित बनो! संगठित रहो! संघर्ष करो!‘ यह महामंत्र् जिस महान व्यक्तित्व ने भारतीयों को दिया–वेे डा–ॅ भीमराव अम्बेडकर थे, जिनकी जयन्ति भारत के कोने कोने में बडी धूमधाम से मनाई जाती है । बाबा साहब का जन्म बैसाख प्रतिप्रदा संंवत् 1946 तदानुसार यानी 14 अप्रैल, 1891 को मऊ, मध्य प्रदेश में रत्नगिरी जिले के आंबावडे गांव के कबीरपंथी मालोजी सकपाल के पुत्र् रामजी के घर भीमाबाई की कोख से हुआ । रामजीराव उस समय ब्रिटिश सेना में वहॉ पर सूबेदार थे । उस समय किसी को यह स्वप्न में परिकल्पना नहीं थी कि यह शिशु एक दिन अछूतोद्धार, सामाजिक तथा धार्मिक विषमताओं के घृणित वातावरण की उस समय की पकी हुई फसल को अपने संघर्ष और श्रम रूपी धारदार हथियार से काटने में सफल होकर स्वतत्र्ं भारत के संविधान निर्माता सभा के अध्यक्ष बनकर भारत के दबे–कुचले, पिछडे और बेबसों तथा समाज के अंतिम पायदान पर धकेले जा चुके जनमानस वर्ग को गौरवपूर्ण जीने का सम्मान दिलाने वाला नायक बनेगा । बाबा साहब के जुझाारू और संघर्षशील व्यक्तित्व ने उन्हें डॉक्टर भीमराव से बाबा साहब बना दिया जिनकी सोच और विचारों से आज पूरा देश कायल है ।
बाबा साहब ने अंधविश्वास , अंध श्रद्धा तथा मृतपरख मूल्यों से समाज को मुक्ति दिलाने का जो अभियान चलाया वह पूर्णत: सफल हुआ है । बाबा साहब ने उन ब्राह्मणों की अति प्रशंसा की है जिन्होंने दलित अनन्दोलनों के शुरूआती दौर में अपने सजातियों ब्रह्मणोंकी परवाह न करके बाबा साहब के साथ संघर्षशील रहै । राजनीति में उन्होंने दलितों तथा वंचितों को सत्ता व्यवस्था में आव’यक भागीदारी की जोरदार पैरवी की जिसके आधार पर संविधान में आरक्षण नीति का प्रावधान हो सका । बाबा साहब का विरोध ब्राह्मणों से नहीं, अपितु ब्राह्मणवाद से था क्योंकि ब्राह्मणवाद में संकीर्णता पैर जमाये हुए है जो गर्व और अंहकार के कारण सब की अवहेलना करने वाली तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली सोच है ।
बाबा साहब द्वारा बनाए गये संविधान ने आज संभावनाओं का विस्तृत आकाश, अवसरोंं के सुरक्षित आयाम, महत्वकांक्षाओं की उडान पूर्ति के लिए बनाई गई नीतियों ने हाशिये पर धकेले गये समाज को देश और समाज की मुख्यधारा की सशक्त इकाई बना दिया है । आज बाबा साहब का संघर्षशील अभियान सफलता पूर्वक फलित हो रहा है क्योंकि देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में संविधान की जो नीतियां अपनायी जा रहीं हैं उनके अनुसार सब को विकास के अवसरों और अधिकारों पर सब को समान हक का प्रावधान है जिसका प्रत्यक्ष परिणाम है कि आज भारत अपने संविधान के निर्देशानुसार विकास की सीढी दर सीढी ऊपर ही ऊपर बढता जा रहा है । आज देश सदियों की गुलामी की केंचुली से बाहर होकर क्रमिकरूप से प्रगति और विकास के वैज्ञानिक मानकों पर अपनी श्रे”ठता सिद्ध करता जा रहा है ।
बबा साहब का दर्शन एक जीवांत विचार है । वे भारत के अनुपम अमरदीप तथा अनमोल रत्न हैं । उनके क्रान्तिकारी विचारों को वर्ग विशेष, जातिवाद और संकीर्णता की परिधि में नहीं बांधा जा सकता क्योंकि उनका दर्शन पराधीनता से मुक्ति दिलाने वाला मंत्र् है । बाबा साहब ने सामाजिक नैतिकता को श्रे”ठ माना है, उन्होंने कहा है–‘लोग और उनके धर्म सामाजिक नैतिकता के आधार पर सामाजिक मानकों द्वारा परखे जाने चाहिएं । अगर धर्म को लोगों के भले के लिए आवश्यक मान लिया जायेगा तो अन्य किसी मानक का मतलब नहीं रहेगा ।‘ डा–ॅ अम्बेडकर जी मानवता के सच्चे सेवक थे । उन्होंने महान व्यक्ति और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के मध्य जो गहरी और सरल रेखा खींची वह अन्य दुर्लभ ही दिखाई पडती है । उनके शब्दों में‘एक महान व्यक्ति एक प्रतिष्ठित व्यक्ति से भिन्न है क्योंकि वह समाज का सेवक बनने के लिए सदैव तैयार रहता है ।‘ डा. अम्बेडकर एक महान व्यक्ति थे जिनका सम्पूर्ण जीवन समाज सेवा को समर्पित था । उनकी प्रत्येक स्वांस समाज और देश को समर्पित थी । उनकी जीवन पर्यन्त यही अभिलाषा थी कि प्रत्येक भारतीय शुरू से आखीर तक भारतीय ही बना रहे ।
संक्षेप में बाबा साहब इस युग के एक ऐसे नायक हैंं जिन पर सब को गर्व है जिनके मन का आदर–मान प्यार के साथ जुडकर श्रद्धा–भक्ति में बदल गया है और समाज में वैचारिक ऊर्जा धधकते ज्वालापिंड की भान्ति होकर उन्हें पूजनीय बना दिया है । आज भवनों, सडकों तथा मार्गों के चैराहों पर उनकी प्रतिमाएं विराजमान हैं जिन पर साल में दो बार श्रद्धासुमन बरसाकर समाज अपना श्रद्धा–भाव दर्शाता है । बाबा साहब ने जो अछूत, दबे–कुचले, पिछडे, वंचित व्यक्ति जो समाज के अंतिम छोर पर था, उसके लिए जो कार्य किया वह अद्वितीय, अनुपम, बंदनीय एवं अभिनंदनीय है । बाबा साहब को शत शत नमन । नत्थी सिंह बघेल

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