घर कहीं गुम हो गया है

घर कहीं गुम हो गया है मकानों के  बीच

घर कहीं गुम हो गया है

विशाल गगनचुंबी  इमारतों  के  बीच

घर  कहीं दब  गया है

ख्वाहिशों  के ढेर के बीच

घरों के प्रेमरुपी दरख्तों पर से

अपनेपन के पत्ते  झड़ चले हैं

नहीं खिलते हैं अब इन दरख्तों पर

स्नेह और प्रेम के फूल

लगता है जैसे अब हर मौसम

हो चला है पतझड़ का

मौसम ने बदलना बन्द कर दिया है

रुक गया है मौसम

पतझड़ से आगे बढ़ता ही  नहीं

तस्वीरें सजा करती हैं जो

घरों की दिवारों पर

अब वो जीवंत  नहीं  लगा करती

सभी  रंग दिखायी  पड़ते  हैं

उन तस्वीरों में

पर प्यार का रंग ना जाने क्यूँ

गुम सा  मालूम पड़ता  है

जो तस्वीरें दीवारों पर सजे हुए

पहले बोला करती थीं

अब खामोश सी गुमसुम उदास

मालूम पड़ती हैं

घर कहीं गुम हो गया है

गगन छूने की हसरतों के बीच

उर भूमि अब तब्दील होती जा रही है

मरुभूमि में

उर भूमि पर उग आये हैं

एकाकीपन के केक्टस

मन  बन गया है

अरावली  का बीहड़

बीहड़ में ढूंढते हैं

सभी अपनेपन  को

ढूँढ  रहे  हैं बरसों से

पर मिलता नहीं

शायद दफ़न हो गया है

स्वार्थीपन का नक़ाब पहनकर

मन के किसी कोने में

इसलिए  पहचान में नहीं आता

घर कहीं गुम हो गया है

ज़िंदगी की दौड़ती भागती

इस भागमभाग में

मोबाइल में  कैद होकर रह गए हैं

सारे रिश्ते

मोबाइल फ़ोन में  ही अब

सबसे होने लगी हैं मुलाकातें

रिश्तेदारों की सूची

अब पड़ गई है छोटी

मोबाइल मित्रों की

बढ़ गई है सूची

ना पहले से खाते सब

घर के आँगन में बैठकर

स्नेह की खिचड़ी

ड्रॉइंग रुम के सोफ़े

अब किया करते हैं 

इन्तज़ार मेहमानों का

मुहँ चिढ़ाया करते हैं सोफे

अब खाली पड़े पड़े

कृत्रिम प्रेम झलकता है

अब चेहरों से

ना पहले सी मिठास और गरमाहट

बची अब रिश्तों में

घर कहीं गुम हो गया है

आकांक्षाओं के घने जंगल में

घर कहीं गुम हो गया है

मकानों के बीच…….. priyamvada ‘पीहू ‘

प्रियमवदा

Author: admin

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