कविता और कहानी
व्यंग्य: ईर्ष्या की प्रासंगिकता — राजेन्द्र परदेसी
पता नहीं किस मूड में हमारे पूर्वजों ने यह युक्ति गढ़ दी कि “ईर्ष्या कबहूँ न कीजिए”। मुझे तो ऐसा लगता है कि उन्हें शायद किसी की प्रगति देखी नहीं गई, तभी हताश होकर उन्होंने यह उक्ति बना दी। वरना यह तो सर्वविदित है कि लोग उसी से ईर्ष्या करते हैं जो प्रगति-पथ पर बढ़ता…
मर्यादा भूले सभी -डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’
विधा- कुंडलिया छ्न्द प्रभुवर के दरबार में, मचा शोर चहुंँओर। मर्यादा भूले सभी, देखो चन्दा चोर। देखो चन्दा चोर,अजब हिम्मत दिखलाई। भूल गए हर ज्ञान, बड़ों ने जो सिखलाई। लालच में वह देख, दिखे कब उनको रघुवर। पायेंगे वह दंड, सजा देंगे अब प्रभुवर।। माया ने पागल किया, भूल गए प्रभु नाम। उनके ही…
तुमने लड़ना क्यों छोड़ दिया? – अम्ब्रीश श्रीवास्तव
माँ अक्सर कहा करती थीं,“जहाँ प्रेम होता है, वहीं लड़ाई भी होती है।” बचपन में मुझे यह बात समझ नहीं आती थी। लगता था कि प्यार और लड़ाई तो एक-दूसरे के दुश्मन हैं। लेकिन तुम्हारे साथ रहते-रहते समझ आया कि माँ कितनी सही थीं। याद है, तुम हर छोटी-छोटी बात पर मुझसे लड़ जाया करती…
ऐसा क्यों ?
वन्दना को बहुत दिनों से नहीं देखा तो लगा शायद उसकी शादी हो गयी होगी ।अचानक ही व्हाट्सएप पर उसका नाम दिखा तो गरिमा से न रहा गया उसने मैसेज भेज ही दिया – “अरे वन्दना तू कैसी है ?कहाँ है ?” कुछ समय बाद वन्दना…
गर्मी
1 धरती सारी जल उठी, आसमान है मौन रहबर भी भटका हुआ, राह दिखाए कौन राह दिखाए कौन, पड़ा असमंजस भारी होते सब हैरान, परेशां दुनिया सारी देती सबको प्यार, हमारे दुर्गुण सहती यही मातृ रूपेण, हमारी प्यारी धरती। 2 व्याकुल जन्तु जीव सभी, हलाकान दिन रैन धूप चिलचिलाती बड़ी, करे बहुत बेचैन करे बहुत…
वही सच्चे मजदूर हैं
एक व्यक्ति अपने गाँव से एक किलोमीटर दूर, पहाड़ों की तलहटी में जाकर बार-बार हथौड़ा उठाता है, और पूरी ताकत से पत्थर पर प्रहार करता है। पत्थर को तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटता है, उन्हें वर्गाकार आकार देता, दोनों हाथों से उलट-पलट चौकोर शिला-खण्ड सजाता है— तब जाकर मिलती है मजदूरी, जिससे चलता है उसका…
फागुन लाया रंग की बौछार
फागुन लाया रंग की बौछार भरी पिचकारी गुलाबी हरी लाल टेसू फूल भरी नारंगी थाल खेतन सजे सरसों पीला हार । सिया राम सब रंगे गुलाल खेले जन अवध प्रभु निहारसरयू किनारे लंबी कतार ढोल नगाड़े मृदंग झंकार। कान्हा पर हुई फूलों की बरसात ग्वाल बाल सखियां राधा का भरा प्यारछेड़खानी लठियन लड्डूअन न्योछार मची ब्रज धूम होली त्यौहार। काशी में भोले…
ठिठौली : निशा भास्कर
लट लटकानी डोले गाल पर गुजरिया जरा सुलझा दो मनमोहन साँवारियाँ। चुनर हटाए वेणी खोले रे बावरिया। सुध बिसराई राधा बाजे जब बाँसुरियां। लट सुलझाते कान्हा खोई रे मुंदरियां गुंज माल छिन्न भई भरी रे डगरिया। बाँधी भाव बंधन में हार पहिरावै राधा सखियन ढूँढें अपने प्यारे की मुंदरियां। मुदित मलंग कंठ बोली ललिता सखी …
तब कविता कुछ कहती है
व्यथा से मन की उर्वर भूमि में भावो का रोपण होताकरुणा संग सींचा जाता शब्दों सेतब कविता कहती है। वेदना के स्वर पत्थरों पर गुजर कर पिघला देतेरस की धारा बहती कलम चलती तब कविता कहती है। हृदय की टीस आंसुओं से ना निकल कर कलम सेकरुणावर्षा होती धरा के आंचल तब कविता कहती हैं।…
