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व्यवस्था परिवर्तन बनाम आत्म परिवर्तन -राजेन्द्र परदेसी
पक्ष हो या विपक्ष, चुनाव आते ही दोनों जनता से कहते हैं – “व्यवस्था बदलो”। वही आम जनता, जो प्रतिनिधि चुनकर व्यवस्था चलाने के लिए भेजती है। जिसे अधिक लोग चुनकर भेजते हैं, उसी को सत्ता मिलती है। हम हर पांच साल में एक सपना देखते हैं। “इस बार व्यवस्था बदल जाएगी”। नया नेता आएगा,…
बदलता भारत, बनता भारत
हम जिस भारत के रूप में उभरे हैं, और जिस भारत की हम अभी भी तलाश कर रहे हैं प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस हमें अपने राष्ट्र के अतीत पर चिंतन करने और भविष्य पर विचार करने का अवसर देता है। स्वतंत्रता के पिछले 80 वर्षों में भारत में आए कुछ परिवर्तनों को याद करने का यह…
सामनता पर मुखर हुआ समाज, छात्रों के सब्र का बाँध टूट रहा
मुद्दा : आरक्षण की गलत नीतियों से प्रभावित हो रहा सामान्य वर्ग के छात्रों का भविष्यमांग : जिन राज्यों अथवा गाँवों में आरक्षण की जरुरत बस वही तक सिमित कीजिये आरक्षणसुझाव : आरक्षण रिफार्म कीजिये, आरक्षण को आर्थिक स्थिति पर लागू कीजियेलेखक : पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर रांची में आंदोलनरत छात्रों…
प्रेमचंद की १४६ वीं जयंती पर उनकी पत्नी को समर्पित
‘शिवरानी देवी’ कहावत है- “ हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है।” तथा“ पुरुष की उन्नति में स्त्री का मौन किंतु अपरिहार्य योगदान निहित होता है।” इस कहावतों को चरितार्थ किया है प्रेमचंद की अर्द्धांगिनी शिवरानी देवी ने, जिन्होंने अपने मौन, संयमित एवं अनिवार्य योगदान से प्रेमचंद नामक विराट साहित्य पुरुष…
स्वतंत्रता से विकसित भारत की ओर
15 अगस्त भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिवस है जिसने करोड़ों भारतीयों को स्वतंत्रता का अमूल्य उपहार दिया। यह केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराने और देशभक्ति के गीत गाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन, कर्तव्यबोध और भविष्य के संकल्प का भी दिन है। स्वतंत्रता हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुई; इसके पीछे असंख्य स्वतंत्रता…
अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस पर विशेष “किताबों के पन्नों से लेकर अनकही कहानियों तक”
“किताबों के पन्नों से लेकर अनकही कहानियों तक”… वो दोस्त जो हमारी डायरी के हिस्से होते हैंUmaMehtaTrivedi, freelance writer, Karnataka जिंदगी की किताब में कई पन्ने ऐसे होते हैं जो कोरे छूट जाते हैं,लेकिन कुछ पन्नों पर शब्दों की जगह कुछ खास लोगों के हस्ताक्षर होते हैं। अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस के अवसर पर जब हम…
पेपर लीक पर गैर-भाजपा सरकारों से जवाबदेही कब?
– डॉ. सत्यवान सौरभ – भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल रोजगार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, परिवारों की उम्मीदों और सामाजिक न्याय की आधारशिला भी हैं। कोई भी परीक्षा तभी सार्थक मानी जाती है जब उसमें प्रतिभा, मेहनत और निष्पक्षता का सम्मान हो। लेकिन जब प्रश्नपत्र लीक हो जाता है, तो…
कहां चला गया पुलिस के हाथों में लहराने वाला डंडा
संजय सक्सेना,लखनऊ,वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश की सड़कों पर वर्षों तक एक दृश्य बेहद सामान्य हुआ करता था, जो अब केवल पुरानी यादों या पुलिस थानों की धूल फांकती फाइलों में सिमट कर रह गया है। खाकी वर्दी पहने एक पुलिस कर्मी, जिसके हाथ में एक लंबी, मजबूत और पॉलिश की हुई बेंत की लाठी होती…
कॉकरोच आंदोलन: गांधीवाद की छाया या डिजिटल युग का नया प्रतिरोध?
– डॉ. प्रियंका सौरभ भारत में जब भी कोई नया जन-आंदोलन उभरता है, उसे पुराने वैचारिक फ्रेमों में समझने की कोशिश होती है। कॉकरोच आंदोलन के साथ भी यही हुआ है। कुछ लोग इसे युवाओं के असंतोष की नई अभिव्यक्ति मानते हैं, तो कुछ इसे गांधीवादी परंपरा की छाया में पढ़ने का प्रयास कर रहे…
