Special Article
इस ब्रह्माण्ड में :- सवर्ण सिर्फ टैक्स भरने, सीजेपी धरना देने, कांग्रेस शोषण करने, सपा जातिवाद करने और बीजेपी वाले देश बचाने आए है ….पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
यह पूरा लोकतंत्र एक पूरी आकाशगंगा है जिसमें अच्छे बुरे ग्रह और करोड़ों तारे सपा बसपा रूपी नक्षत्र और असपा प्रसपा रूपी कंजड़ उल्का पिंड जिनके बीच में एक मोदी नाम का सूरज जल रहा है। इस गैलेक्सी के एक कोने में, एक छोटा सा भगवा झंडा लगा है जिसके नीचे लिखा है – सवर्णों…
सस्ता डेटा या तेज उपग्रह नेटवर्क: भारत के लिए कौन है बेहतर? – महेन्द्र तिवारी
भारत में इंटरनेट की दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अब तक देश में इंटरनेट की पहुँच बढ़ाने का प्रमुख आधार मोबाइल टावर, भूमिगत प्रकाशीय तंतु और दूरसंचार नेटवर्क रहे हैं। लेकिन उपग्रहों के माध्यम से इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली तकनीक ने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं। इस परिवर्तन के…
राजनीतिक सफरनामा : हमसे क्या भूल हुई जो ये सजा हमको मिली…
कुशलेन्द्र श्रीवास्तवदेश की राजधानी दिल्ली मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के चलते अस्त-व्यस्त हो चुकी है। दो अक्टूबर से लगातार चल रहे धरना-प्रदर्शनों ने दिल्लीवासियों के साथ-साथ देश के कोने-कोने से आने-जाने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दस अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के धरने के दौरान दो सौ…
बस कीजिये ! देशव्यापी व्यवस्था चलने दीजिये, धरनो से धारणा नहीं बदलेगी…!
सवर्णों से दूर हुई पार्टियों का ही अस्तित्व खत्म हुआ हैदेश का पॉलिटिकल लोकतंत्र दो संविधान चलवा रहा,एससी/एसटी एक्ट और यूजीसी रेगुलेशन देश विरोधी.! पहले गरीबों को उनका हक़ दीजिये तब जाति और आरक्षण की बात कीजिए पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी बड़ी ही विकराल स्थिति है एक सवाल का कुछ…
राजनीतिक सफरनामा : चुनाव आयोग पर उठते सवाल
कुशलेन्द्र श्रीवास्तवभारत का चुनाव आयोग चर्चाओं मेें हैं, चुनाव आयोग से ज्यादा चर्चाओं में ज्ञानेश कुमार हैं जो मुख्य चुनाव अधिकारी हैं । जब से वे मुख्य चुनाव अधिकारी बने हैं तब से ही वे चर्चाओं मेें हैं । कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली होती ही ऐसी है कि वे विवाद को जन्म देते रहते हैं…
माँ बोली—अतीत से भविष्य तक
डॉ. विजय गर्ग माँ बोली केवल बातचीत का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह हमारी पहचान, भावनाओं, संस्कृति, स्मृतियों और सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। बच्चा दुनिया को समझने से पहले अपनी माँ की आवाज़ और शब्दों को पहचानना शुरू करता है। माँ की लोरी, परिवार की बातचीत, दादा-दादी की कहानियाँ और घर में…
स्कूलों की चमक से आगे सीखने की गुणवत्ता
भारत में स्कूली शिक्षा की बहस लंबे समय तक विद्यालयों की संख्या, नामांकन और बुनियादी सुविधाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। अब प्रश्न बदल रहा है। बच्चा विद्यालय में पहुंच रहा है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि विद्यालय पहुंचने के बाद वह सीख क्या रहा है, उसकी जिज्ञासा कितनी…
कल्पनाएँ , स्वप्न या सत्यमूल : आशा सहाय
कल्पनाएँ जो सामान्य शब्दों में मनोजगत की सृष्टि समझी जा सकती हैं और मानव निर्मित दृश्य और अदृश्य जगत को प्रभावित कर, उसे रंग रूप और आकार देती हैं ,वे स्वयं कहाँसे और क्यों सृष्ट होती हैंयह एक विचारणीय प्रश्न है।कल्पना से क्या ज्ञान का कोई सम्बन्ध है?क्याये सत्य के समीप होती हैं अथवा उसके…
जातिवादी नेता ही देश में असली समस्या, सोशल मिडिया पर सनातन और सवर्ण है इनके निशाने पर ……
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी इसमें ग़लत है क्या कुछ..? ये जातिवादी गुंडे आरक्षणम देहि बोलते बोलते एक धरने में रोज़ घुसते हैं और बिना लॉग लपेट के खाना खाकर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद बोलकर चल देते है। आख़िर ये सब नेता और साहेब के चेले ही तो हैं जिन्होंने अस्सी साल तक…
