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चित्रगुप्त पूजा—सिर्फ़ कायस्थ क्यों करें?

“जो कलम से सृष्टि के कर्मों का लेखा लिखते हैं, क्या वे केवल एक जाति के आराध्य हो सकते हैं?” भारतीय संस्कृति में पूजा, केवल देवी-देवताओं की आराधना नहीं, बल्कि अपने कर्म, साधन और दायित्व के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम भी है। यहाँ हल पूज्य है, शस्त्र पूज्य है, पुस्तक पूज्य है और…

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लघुकथा : देवी का मंदिर : रामदेव धुरंधर

मॉरीशस सिलिया और मातादीन बचपन से पड़ोसी हुआ करते थे। दोनों साथ खेले और बड़े हुए। बाद में सिलिया के घर – परिवार में तंगहाली आने से वह स्वयं जान न पायी कैसे वेश्यावृत्ति के लिए विवश हो गई। मातादीन वहीं गाँव के मंदिर का पुजारी हुआ। अब वे पड़ोसी न हुए। मातादीन को मंदिर…

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मोबाइल की चमक मृगतृष्णा है —-राजेन्द्र परदेसी

शहर का युवा आज सबसे ज्यादा व्यस्त दिखता है और सबसे ज्यादा खाली भी वही है। उसके हाथ में हमेशा मोबाइल है। उसकी आँखें हमेशा स्क्रीन पर हैं। उसे हर पाँच मिनट में देखना है कि उसकी पोस्ट पर कितने लाइक आए, कितने कमेंट आए, किसने क्या कहा। यही बेचैनी आज शहर के युवा की…

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रिजिम चेंज की व्यवस्था में लगे दरबारी, संकट में सन्मार्ग….

रिजिम चेंज की व्यवस्था में लगे दरबारी, संकट में सन्मार्ग….पंकज सीबी मिश्रा राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपीबताओ रिजिम कैसे चेंज होगी ? ब्राह्मणवाद मिटाने से, मनुवाद जलाने से, सवर्ण गरीबों को सताने से या लोकतंत्र हथियाने से ! बताओ पक्ष और विपक्ष वालों कैसे बदलेगा रिजिम ! और क्या भरोसा की नए रिजिम में…

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वैश्विक न्याय के लिए जरूरी है सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन — महेन्द्र तिवारी

दुनिया में शांति, सुरक्षा और सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से बने संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसकी प्रासंगिकता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद 1945 में स्थापित इस अंतरराष्ट्रीय संस्था से अपेक्षा की गई थी कि वह भविष्य में…

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राजनीतिक सफरनामा – राजनीति में अभद्र भाषा का दौर

अध्यक्ष मल्लाकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी जी को लेकर बिहार के पटना मेे जो टिप्पणी की वह बदलती राजनीति की ही तस्वीर है । ऐसा नहीं है कि किसी भी राजनीतिक दल के नेता ने पहली बार ऐसी भाषा का प्रयोग किया हो । राजनीतिक दल कोई भी हो और नेता कितना ही बड़ा क्यों…

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मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी —डा रेखा यादव ‘निर्झर’

मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगीमैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी,और ख़ुद को ख़ुद ही पढ़ूँगी।इन काग़ज़ के पन्नों में छिपीमेरी अनगिनत कहानियाँमेरी आँखों के आँसू ख़ुद पोंछेंगी।मेरा घर कहाँ है?मेरा ठिकाना कहाँ है?शायद इन काग़ज़ के पन्नों मेंमेरी पहचान छिपी होगी।मेरे इन मज़बूत कंधों के भीतररोते हुए एक बेबस दिल की कहानी लिखूँगी।हज़ारों की भीड़ में…

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लघुकथा : अभिशप्त

–डॉ. कृष्ण शाह यात्री(नेपाल) वह फूलवारी एक नमूने के रूप में बसाई गई थी। वहाँ हर तरह के फूलों ने शोभा बढ़ा रखी थी। उस फूलवारी की ख्याति, सुगंध और सुंदरता सारी दुनिया में फैली हुई थी।उस फूलवारी में कुछ निर्मम काँटे भी थे। वे काँटे हमेशा फूलों को हानि पहुँचाने की कोशिश करते थे।…

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ग़ज़ल : डा. अफ़रोज़ आलम-कुवैत

ग़मों ने घेर लिया जब मुझे ख़ुशी की तरहतुम्हारी याद का साया था ज़िन्दगी की तरह तेरे ख़्याल की वादी में गुम हुआ जो कभीये आंख बहने लगी मनचली नदी की तरह है एहतियात में डूबा हर एक हर्फ़ उसकावो ख़त भी लिखता है मुझको तो शायरी की तरह गिला मैं कैसे करूं उसकी बेवफ़ाई…

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