कविता और कहानी
पिता (कविता-2)
दीया में तेलशक्ति भले क्षीण हो पिता सूर्य की तरह जला है; राहें अंधियारी उबड़ खाबड़ अपनों के खातिर सदा चला है! अपनों के खातिर सदा चला है!! 🌹 तूफान के साये काले कंदर्प टूटा न उसका लोहित दर्प लहूलुहान हुआ अपनों के लिए दिल में रख बस एक तड़प! दिल में रख…
पिता…… (कविता-1)
कमाने के लिये वो दिन रात को भूल जाते हैं होते ही शाम को वो सबके लिए कुछ लाते हैं खुद सारे शौक को कुर्बान कर जाते हैं मेरे पापा हमें हर खुशियां दे जाते हैं स्कूल से जब में घर को आता हूँ वो जब घर में छुप जाते हैं मेरे ढूंढ़ने पर जब…
है याद मुझे माँ (कविता-10)
याद नहीं कब मैंने माँ तुझ में ली अंगड़ाई थी जीवन जीने हेतु तन से तेरे मीठी अमृत पाई थी तूने ही मेरे हाथों में सबसे पहले कलम थमाई थी है याद मुझे माँ ऊँगली थामे स्कूल छोड़ने आई थी सबसे प्रिय वो लाल साड़ी जो तूने स्वयं सजाई थी जिद कर मैंने तुझसे उसकी…
मेरी धर्म पत्नी
आओ आज मैं अपनी दिल की बात बताता हूं। जो मेरे दिल की मल्लिका है उसकी कथा सुनाता हूं। जो खुद की बीमारी में भी ध्यान मेरा पूरा रखती है। सेवा करते करते उसके माथे पर शिकन ना दिखती है। ना जाने किस मिट्टी की है रब ने उसे बनाया है। वह सुंदरता की मूरत…
अनुरागी माँ (कविता-8)
कन्टकमय पथ विपदाओं में , उसने चलना सिखलाया है । निज बाँह- पालने झुला- झुला , अधरों से चूम सुलाया है ।। अज्ञान- तिमिर जब गहराए , तब दिव्य- ज्ञान लेकर आई । संसार- सरित ……… । संसार ……….. तुम हो उदारिणी कल्याणी , काली अम्बे सम शक्तिमयी । जगवीर प्रसविनी सृष्टि बिन्दु , विदुषी…
माँ (कविता-8)
माँ मेरी माँ है सबसे प्यारी इस जग में है सबसे न्यारी सुबह सवेरे जग जाती है सबको सुलाकर सो जाती है सबको यत्न से खूब संवारती स्वयं को सहज ही भूल जाती मेरी माँ… आज खुजतो हूँ तुम्हें तारों में, फूलों में, गलियारों में, एक बार सीने से लगा जाओ बाँहों में अपनी सुला…
माँ (कविता-7)
पूरे घर का काम समेट कर थकान से चूर सुस्ताने को लेटी माँ बेटी के आते ही फुर्ती से रसोई में बेसन,सूजी ढूँढ पकौड़ी-हलवा बनाने लगती है! सबके सामने चुप रहने वाली माँ बेटी के आते ही उसके सम्मुख अकेले में मुखर हो उठती है! कुछ दिनों मायके में रहने आई बेटी को जाते समय…
माँ (कविता-6)
वो कहते हैं हमने भगवान नहीं देखा मैं कहता हूँ मेने देखा हैं जब मुझे तकलीफ होती हैं तो मेरी माँ रोती हैं मैं दुनिया का सबसे हसीं लाडला हूँ मेरी शैतानियों का कोई ठिकाना नहीं वो माँ ही तो हैं जो हमारे हर किरदार से प्यार करती हैं किसी भी उम्र मे मुझे डांट लगा…
माँ!.. ..(कविता-5)
याद मुझे है माँ देखो ! अब भी कुछ-कुछ बचपन की वह यादें .. जब तुम रखती थी अंजुरी में भरकर अपने सरसों का वह तेल मेरे सूखे माथे पर और ठोकती रहती थी दोनों कोमल हाथों से तब-तक, जब-तक वह भिन न जाता था सिर के बालों में कहती थी सर की पीरा छू…
ममतामयी माँ (कविता-4)
डॉक्टर सुधीर सिंह माँ की नजरों में वयस्क संतान भी, सदा एक मासूम बच्चा ही रहता है. बूढ़ी जननी की गोद में माथा रख, बीते बचपन में में जब खो जाता है. ममतामयी माँ जब सर सहलाती है, लगता है वह एक अबोध बालक है. पता नहीं चलता है लंबी उम्र तब, आसपास जब ममता…
