Special Article
बेशर्मी और केवल बेशर्मी – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
अपनी धार्मिकता को महसूस किया जा सके पर ऐसा नहीं हो सका । इन दिनों युवाओें का आचरण अजीब ढंग का महसूस किया जाने लगा है । स्वछंदता और बेशर्मी इसके मानक बन चुके हैं । यही कारण है कि देश के विभिन्न अंचलों मेें ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं । शादी-ब्याह को खेल…
मंदिरों में दान न करें…?
पलटें तो पाएँगे कि भारत पर हुए अनेक विदेशी आक्रमणों के पीछे मंदिरों में संचित अपार संपदा भी एक प्रमुख कारण रही है। कुषाणों, हूणों और बाद के अनेक मुस्लिम आक्रमणकारियों की दृष्टि भारत की समृद्धि और मंदिरों में संग्रहित अकूत धन पर रही। सत्ता-विस्तार की महत्वाकांक्षा के साथ-साथ इस संपदा को प्राप्त करना भी…
अग्नि-जाल में बदलते शहरी भवन — डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत आज विश्व के सबसे तेज़ी से शहरीकरण करने वाले देशों में शामिल है। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, सेवा क्षेत्र के विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर निरंतर हो रहे पलायन ने भारतीय शहरों का स्वरूप तेजी से बदला है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक बहुमंजिला इमारतें, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, कोचिंग संस्थान, होटल, अस्पताल…
विश्व बदला, परिषद क्यों नहीं?
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की अनिवार्यता भारत की स्थायी सदस्यता का दावा और सुधार प्रक्रिया की संरचनात्मक चुनौतियाँ — डॉ. प्रियंका सौरभ द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना हुई, तब विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक परिस्थितियाँ आज से…
तुमने लड़ना क्यों छोड़ दिया? – अम्ब्रीश श्रीवास्तव
माँ अक्सर कहा करती थीं,“जहाँ प्रेम होता है, वहीं लड़ाई भी होती है।” बचपन में मुझे यह बात समझ नहीं आती थी। लगता था कि प्यार और लड़ाई तो एक-दूसरे के दुश्मन हैं। लेकिन तुम्हारे साथ रहते-रहते समझ आया कि माँ कितनी सही थीं। याद है, तुम हर छोटी-छोटी बात पर मुझसे लड़ जाया करती…
भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ता अविश्वास
– डॉ. सत्यवान सौरभ भारत और बांग्लादेश के संबंध दक्षिण एशिया की कूटनीति में विशेष महत्व रखते हैं। वर्ष 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय भारत ने जिस प्रकार राजनीतिक, सैन्य और मानवीय सहयोग प्रदान किया, उसने दोनों देशों के बीच मैत्री और विश्वास की मजबूत नींव रखी। पिछले पाँच दशकों में व्यापार, सुरक्षा,…
पूर्ण न्याय और संवैधानिक संतुलन
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह है कि उसने राज्य की शक्ति को केवल शासन चलाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का दायित्व भी सौंपा। इसी कारण भारतीय संविधान को केवल शासन संचालन का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, राजनीतिक समानता और मानवीय गरिमा का…
पचास के बाद पेरेंट्स और बच्चे का भविष्य
(देर से संतान, जल्दी चिंताएँ?) — डॉ. प्रियंका सौरभ विज्ञान ने मानव जीवन को अनेक सुविधाएँ और संभावनाएँ प्रदान की हैं। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति ने उन दंपतियों के लिए भी माता-पिता बनने का मार्ग खोल दिया है, जो किसी कारणवश प्राकृतिक रूप से संतान प्राप्ति में सक्षम नहीं थे। IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसी…
नकाब में सफेदपोश : देते है भगवान को धोखा, इंसा को क्या छोड़ेंगे..!
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी मंदिरों और स्कूलों में आया धन जनता का धन होता है। यह भगवान और माँ सरस्वती के नाम पर श्रद्धाभाव से अर्पित किया जाता है, हलांकि ईश्वर तो बस श्रद्धाभाव से पत्रं पुष्पं फलं तोयं के ही आकांक्षी हैं लेकिन विद्या का मंदिर कही कही तो…
कोकरोच पार्टी, टूलकिट और जेन-जी को भड़काने का षड्यंत्र — परदे के पीछे कौन?
– डॉ. प्रियंका सौरभ आज का युग सूचना और संचार का युग है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विचारों के आदान-प्रदान को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। एक समय था जब जनमत बनाने का काम अखबारों, पत्रिकाओं और टेलीविजन तक सीमित था, लेकिन अब एक साधारण मोबाइल फोन और इंटरनेट कनेक्शन के माध्यम…
