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स्कूलों की चमक से आगे सीखने की गुणवत्ता
भारत में स्कूली शिक्षा की बहस लंबे समय तक विद्यालयों की संख्या, नामांकन और बुनियादी सुविधाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। अब प्रश्न बदल रहा है। बच्चा विद्यालय में पहुंच रहा है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि विद्यालय पहुंचने के बाद वह सीख क्या रहा है, उसकी जिज्ञासा कितनी…
कल्पनाएँ , स्वप्न या सत्यमूल : आशा सहाय
कल्पनाएँ जो सामान्य शब्दों में मनोजगत की सृष्टि समझी जा सकती हैं और मानव निर्मित दृश्य और अदृश्य जगत को प्रभावित कर, उसे रंग रूप और आकार देती हैं ,वे स्वयं कहाँसे और क्यों सृष्ट होती हैंयह एक विचारणीय प्रश्न है।कल्पना से क्या ज्ञान का कोई सम्बन्ध है?क्याये सत्य के समीप होती हैं अथवा उसके…
जातिवादी नेता ही देश में असली समस्या, सोशल मिडिया पर सनातन और सवर्ण है इनके निशाने पर ……
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी इसमें ग़लत है क्या कुछ..? ये जातिवादी गुंडे आरक्षणम देहि बोलते बोलते एक धरने में रोज़ घुसते हैं और बिना लॉग लपेट के खाना खाकर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद बोलकर चल देते है। आख़िर ये सब नेता और साहेब के चेले ही तो हैं जिन्होंने अस्सी साल तक…
हनुमान अंश : वह फिल्म जिसने दर्शकों को श्रद्धालु बना दिया : महेन्द्र तिवारी
भारत में समय समय पर ऐसी फिल्में आती रही हैं जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनतीं, बल्कि समाज की भावनाओं, संस्कृति और आस्था से गहरा संवाद स्थापित करती हैं। वर्ष 2026 की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हनुमान अंश भी ऐसी ही एक कृति है। संत नीम करौली बाबा के जीवन, उनकी करुणा, सेवा…
राजनीतिक सफरनामा : जेनजी के लिए लालीपाप का दौर – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
भारत में आजकल जेनजी हीरो बन चुके हें जिसे देखो वह ही जेनजी को मनाने-थपाने मेें लगा हुआ है । जेनजी कल तक सो रही थी, राजनीतिक पार्टिंयां उन्हें नारे लगवाने के काम में लगा कर उन्हें अपनी ही ताकत से विस्मृत कर देती थीं । वही जेनजी दिल्ली मेें कॉकरोच पार्टी के आन्दोलन के…
1991 के आर्थिक संकट में एस. वेंकिटारमनन की निर्णायक भूमिका
आज गवर्नर फ़िल्म देखकर 1990-91 में भारत के आर्थिक संकट की भयावह याद ताज़ा हो गई, जब भारत लगभग दिवालिया होने के कगार पर खड़ा था। आज भारत 693 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ विश्व के अग्रणी देशों की क़तार में खड़ा है। तब यह विश्वास करना कठिन था कि साढ़े तीन…
ब्रिक्स की ‘गूंज’ वाशिंगटन से इस्लामाबाद तक खलबली
अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार,लखनऊ ( उ. प्र.)नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच पर जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साथ कैमरे के सामने आए, तो वाशिंगटन से लेकर पश्चिमी राजधानियों तक भू-राजनीतिक हलचल तेज होना लाजिमी था।…
आत्मविश्वास : -अजय कुमार पाण्डेय
हैदराबाद की प्रतिष्ठित टेक कंपनी की सुबह हमेशा की तरह व्यस्त थी। सभी लैपटॉप, ई-मेल, ऑनलाइन मीटिंग और समय-सीमाओं के भीतर अपने लक्ष्य की दौड़ में व्यस्त थे।कंपनी की चकाचौंध में साधारण कपड़े पहने घबराया हुआ चेहरा और आँखों में कहीं नौकरी से न निकाल दिए जाने की आशंका लिए रवींद्रन हड़बड़ी में कई गड़बड़ियाँ…
डिजिटल युग में हिंदी : उमा त्रिवेदी
(14 सितंबर – हिन्दी दिवस पर विशेष) तकनीक की नई जुबां और बढ़ती पैठ”निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल।बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥”“भारतेंदु हरिश्चंद्र”एक दौर था जब यह आशंका जताई जाती थी कि अंग्रेजी और आधुनिक तकनीक के बढ़ते वर्चस्व के बीच हिंदी कहीं पीछे न छूट जाए। लेकिन डिजिटल…
कचरे के ढेर, बीमारियों के शहर – डॉ. प्रियंका सौरभ
हम अपने घर को साफ रखने के महत्व से अवगत हैं, लेकिन जैसे ही हम अपने घर से बाहर निकलते हैं, हमारी जिम्मेदारी की भावना गायब हो जाती है। कई लोगों को घरेलू सामान सड़क के किनारे, नाले में, खाली जगह पर या सार्वजनिक स्थानों पर फेंकने की आदत पड़ गई है। प्लास्टिक बैग, पॉलिथीन,…
