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कोरोना भगवान की जय ?

यशपाल सिंह प्राचीन कथा है कि एक था हिरणाकश्यप। शक्तिशाली था । राजा था। अमर होना चाहता था, जैसे कोई भी राजा होना चाहेगा । ईश्वर की स्तुति की। ईश्वर प्रकट हुए मगर उन्होंने कहा कि अमरता को छोड़कर कुछ भी मांग लो। लेकिन वह तो अमर होना चाहता था। इसलिए उसने अपने मरने की…

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विडम्बना

नहीं सुनना था वो सुनते रहे हैं। हम अपना सर सदा धुनते रहे हैं।। जो पिस्सू की तरह खूँ चूसते हैं। उन्हें ही आजतक चुनते रहे हैं।। मकां बन जाए, रोटी भी मिलेगी। जन्म से बात यह, सुनते रहे हैं।। हमारे जीते जी पूरे न होंगे। हम ऐसे ख़्वाब क्यों बुनते रहे हैं।। हमें तो…

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यथा सत्य

चाहे जो हो सदी है प्रमाणित यही, आस्तीनों में ही साँप पलते रहे। खून भी दूध भी सब पिया है मगर, फिर भी वो तो जहर ही उगलते रहे।। मंथरा थी कुटिल, कैकेई कोमल हृदय, फिर भरा है जहर, कैकेई बस में हुई। राम को वन, भरत को सिंहासन मिले, वो अयोध्या की ही राजमाता…

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वो , कोरोना और मैं

मेरी ड्यूटी राजकीय अस्पताल में थी | यहां दिनोदिन कोरोना के नये मरीज आ रहे थे |बहुत सारे यहाँ से ठीक होकर भी चले गये | एक शाम को ड्यूटी समाप्त करके घर जाने ही वाला था कि एक अर्जेंट केस के लिए मुझे बुलाया गया | उसकी सांसे फूल रही थी | रात आँखों…

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आँसू जो तेज़ाब बन गये

प्रवासी नहीं,ये भारतवासी हैं,सैंकड़ों हजारों किलोमीटर दूर पैदल चलने को मजबूर हैं,इन्हीं को आप राष्ट्र निर्माता कहते हैं,भाग्य विधाता कहते हैं,यही तो आपके मतदाता हैं, जिन्होंने आप को सत्ता तक पहुंचाया है, यही हैं वो,जिनके बारे में संविधान की प्रस्तावना में लिखा है-“हम भारत के लोग”जिन गाँवो को ये लोग लौट रहे हैं, वे सालों…

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मुसाफिर हूँ यारों

लगातार मजदूरों के पलायन की बातें सुन सुनकर और टीवी, व्हाट्सएप जैसे बहुत से माध्यमों के द्वारा बड़ी ही दुखदाई फोटो देख-देख कर मन बहुत ज्यादा व्यथित हो रहा था।सोच रहा था क्यों ना कुछ मजदूरों के पास जाकर उनकी स्थिति को जाना जाए।           मन के कोतुहल को मिटाने के लिए मैंने इन लोगो…

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बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिंदुस्तान की : कविता मल्होत्रा

इस बार गर्मी की छुट्टियों से पहले ही स्कूल बँद हो गए, और बढ़ी हुई छुट्टियों के साथ ही बच्चों का नानी-दादी के घर पर जाना बँद हो गया, दोस्तों  के साथ बाहर खेलना-कूदना सब बँद हो गया।असमँजस की स्थिति में सभी बच्चे व्याकुल होकर लॉकडाऊन के ख़त्म होने का इँतज़ार कर रहे हैं। पूछे…

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मैं जानता हूं

                            मैं जानता हूंँ                        कि बड़े- बड़े चट्टान                       हो जाते हैं मिट्टी- धूल।                     जब मानुष अपनी आलस,                अपनी नाकामी को जाता है भूल।                     मिल जाता है लक्ष्य उसे                  बन जाता जब है वो कलाम।                जब नहीं भीत होता है काँटों से                 बन जाता है मिसाल का नाम।…

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बातों ही बातों में (लघुकथा)

किस्तूरी आज बहुत चिढी़ हुई थी अपनी पडोसिन कमला  से। उसकी सारी पोलपट्टी खोल दी। वो भी बाल्कनी से। मोहल्ले के सब लोगों ने भी सुन लिया होगा। जब से  लाकडाउन  में थोडी छूट मिली है, सभी अपने घर के बाहर  कुर्सी डालकर चुगलियों का दबा  पिटारा  खोलने लगती हैं। जो उस समय  वहाँ नहीं…

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बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की 2 ग़ज़ल व परिचय

ग़ज़ल 1 हम उसे देख कर गए खिल से आँख में ख़्वाब भी हैं झिलमिल से आपका ख़त मुझे मिला लेकिन हाथ मेरे गए थे कुछ छिल से ख़ुद को उसके हवाले करके मैं दोस्ती कर रहा हूँ क़ातिल से मौत क्या रास उनको आएगी ज़िंदगी से फिरे जो ग़ाफ़िल से दर्द उसका वहाँ भी…

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