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भीड़ में अकेले: आधुनिक मित्रता के बारे में सच्चाई 

डॉ विजय गर्ग  आज की अति-कनेक्टेड दुनिया में, दोस्ती ने एक नया रूप ले लिया है जो स्क्रीन, सूचनाओं और डिजिटल बातचीत से आकार लेता है। हम पहले से कहीं अधिक जुड़े हुए हैं, सैकड़ों या हजारों ऑनलाइन संपर्क सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर हैं। फिर भी, विरोधाभासी बात यह है कि कई लोग…

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जनप्रतिनिधियों की पेंशन पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की सख्त टिप्पणी के बाद बहस तेज—क्या पूर्व सांसदों को मिलने वाली पेंशन समानता के सिद्धांत के अनुरूप है या यह विशेषाधिकार का उदाहरण?) – डॉ. प्रियंका सौरभ भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ जनता सर्वोच्च मानी जाती है और जनप्रतिनिधि जनता के सेवक के रूप में कार्य करते हैं। परंतु समय-समय…

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ई-चालान, ई-स्मार्ट मीटर और महंगे एजुकेशन सिस्टम से परेशान जनता

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी टेक्नोलॉजी का उपयोग और दुरूपयोग अपनी जगह है पर सरकारी तंत्र में टेक्नोलॉजी ने हड़कंप मचा दिया है। इस ट्रिपल ई ने आम जनता के नाक में दम करके रख दिया है। जहां एक तरफ भागती दौड़ती जिंदगी में लोगों को सुकून नहीं वहीं दूसरी तरफ…

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“इंडिया इन कोरिया: कोरिया में बौद्ध धर्म का प्रभाव” का भव्य विमोचन

नई दिल्ली/सोल, 27 मार्च 2026. दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल स्थित क्वांगवून यूनिवर्सिटी के सभागार में डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक “इंडिया इन कोरिया: कोरिया में बौद्ध धर्म का प्रभाव” का भव्य विमोचन अंतरराष्ट्रीय विद्वानों और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ। अनुराधा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित इस पुस्तक में भारत और…

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साहित्यिक आयोजनों में जुगलबंदी का जाल

(अकादमियों और संस्थानों की बंद दुनिया में अपनों का उत्सव) – डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय साहित्यिक परिदृश्य सदैव से विविधता, विचारशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक रहा है। यह वह क्षेत्र है जहाँ शब्द केवल रचना नहीं होते, बल्कि समाज के अनुभव, संघर्ष, संवेदनाएँ और परिवर्तन की आकांक्षाएँ भी अभिव्यक्त करते हैं। परंतु वर्तमान…

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सफलता की दौड़ में बुनियादी शिक्षा का पतन

डॉ विजय गर्ग  आज का समय प्रतिस्पर्धा का समय है। हर विद्यार्थी, हर अभिभावक और हर संस्थान एक ही लक्ष्य की ओर भाग रहा है—सफलता। लेकिन इस अंधी दौड़ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है: क्या हम वास्तव में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, या केवल परीक्षा पास करने की कला…

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युद्ध के विनाश से सहमा विश्व

राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तवइजराल-अमेरिका और ईरान का युद्ध अब विभीषिका बनता जा रहा है । लगभग एक माह से चल रहे इस युद्ध ने अब सम्पूर्ण विश्व पटल को सहमा दिया है । युद्ध क्यों हो रहा है इसे कोई सम ही नहीं पा रहा है पर इसके दुष्पिरिणामों से जनसमुदाय परेशान अवश्य है…

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दहेज़ नहीं लिया… या बस नाम बदल दिया?

(एक रुपये के दिखावे के पीछे छिपा “भात” और “रिवाज़” का सच—क्या सच में खत्म हो रही है दहेज़ प्रथा या सिर्फ बदल रहा है उसका रूप?) — डॉ. सत्यवान सौरभ भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता है। यह संबंध परंपराओं, रीति-रिवाज़ों और सामाजिक…

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आजकल के स्कूलो ने ही किसी को दलित तो किसी को सवर्ण  बना डाला….

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  हममें से जितने भी लोग नब्बे के दशक में सरकारी या निजी स्कूलों में पढ़े हैं उनको याद होगा सुबह के  समय असेंबली की शुरुआत प्रार्थना से और राष्ट्गान से होता था और समापन पीटी से होती थी और अंत में सभी शिक्षकों का चरण स्पर्श…

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वही सच्चे मजदूर हैं

एक व्यक्ति अपने गाँव से एक किलोमीटर दूर, पहाड़ों की तलहटी में जाकर बार-बार हथौड़ा उठाता है, और पूरी ताकत से पत्थर पर प्रहार करता है। पत्थर को तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटता है, उन्हें वर्गाकार आकार देता, दोनों हाथों से उलट-पलट चौकोर शिला-खण्ड सजाता है— तब जाकर मिलती है मजदूरी, जिससे चलता है उसका…

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