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माँ बोली—अतीत से भविष्य तक

डॉ. विजय गर्ग माँ बोली केवल बातचीत का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह हमारी पहचान, भावनाओं, संस्कृति, स्मृतियों और सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। बच्चा दुनिया को समझने से पहले अपनी माँ की आवाज़ और शब्दों को पहचानना शुरू करता है। माँ की लोरी, परिवार की बातचीत, दादा-दादी की कहानियाँ और घर में…

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स्कूलों की चमक से आगे सीखने की गुणवत्ता

भारत में स्कूली शिक्षा की बहस लंबे समय तक विद्यालयों की संख्या, नामांकन और बुनियादी सुविधाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही। अब प्रश्न बदल रहा है। बच्चा विद्यालय में पहुंच रहा है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि विद्यालय पहुंचने के बाद वह सीख क्या रहा है, उसकी जिज्ञासा कितनी…

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कल्पनाएँ , स्वप्न या सत्यमूल : आशा सहाय

कल्पनाएँ जो सामान्य शब्दों में मनोजगत की सृष्टि समझी जा सकती हैं और मानव निर्मित दृश्य और अदृश्य जगत को प्रभावित कर, उसे रंग रूप और आकार देती हैं ,वे स्वयं कहाँसे और क्यों सृष्ट होती हैंयह एक विचारणीय प्रश्न है।कल्पना से क्या ज्ञान का कोई सम्बन्ध है?क्याये सत्य के समीप होती हैं अथवा उसके…

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पिता का स्पर्श : अम्ब्रीश श्रीवास्तव

पिता भी करना चाहता है अपने बेटे को स्पर्श, बिल्कुल माँ की तरह,चूमना चाहता है मस्तक को, बिल्कुल माँ की तरह।अपनी गोद में बैठाकर, सहलाना चाहता है बालों को, बिल्कुल उसकी माँ की तरह।लेकिन समाज ने बाँध दिया पिता को कुछ ऐसी उलझनों में,कि वो समय ही न दे पाए, संतान से बंधने में।उसे दी…

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जातिवादी नेता ही देश में असली समस्या, सोशल मिडिया पर सनातन और सवर्ण है इनके निशाने पर ……

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी इसमें ग़लत है क्या कुछ..? ये जातिवादी गुंडे आरक्षणम देहि बोलते बोलते एक धरने में रोज़ घुसते हैं और बिना लॉग लपेट के खाना खाकर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद बोलकर चल देते है। आख़िर ये सब नेता और साहेब के चेले ही तो हैं जिन्होंने अस्सी साल तक…

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हनुमान अंश : वह फिल्म जिसने दर्शकों को श्रद्धालु बना दिया : महेन्द्र तिवारी

भारत में समय समय पर ऐसी फिल्में आती रही हैं जो केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बनतीं, बल्कि समाज की भावनाओं, संस्कृति और आस्था से गहरा संवाद स्थापित करती हैं। वर्ष 2026 की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हनुमान अंश भी ऐसी ही एक कृति है। संत नीम करौली बाबा के जीवन, उनकी करुणा, सेवा…

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राजनीतिक सफरनामा : जेनजी के लिए लालीपाप का दौर – कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

भारत में आजकल जेनजी हीरो बन चुके हें जिसे देखो वह ही जेनजी को मनाने-थपाने मेें लगा हुआ है । जेनजी कल तक सो रही थी, राजनीतिक पार्टिंयां उन्हें नारे लगवाने के काम में लगा कर उन्हें अपनी ही ताकत से विस्मृत कर देती थीं । वही जेनजी दिल्ली मेें कॉकरोच पार्टी के आन्दोलन के…

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1991 के आर्थिक संकट में एस. वेंकिटारमनन की निर्णायक भूमिका

आज गवर्नर फ़िल्म देखकर 1990-91 में भारत के आर्थिक संकट की भयावह याद ताज़ा हो गई, जब भारत लगभग दिवालिया होने के कगार पर खड़ा था। आज भारत 693 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ विश्व के अग्रणी देशों की क़तार में खड़ा है। तब यह विश्वास करना कठिन था कि साढ़े तीन…

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मेहनत ही प्रकाश है

जब मेहनत से जी चुराता है इंसान,अपने जीवन का उद्देश्य भूल जाता है।फिर वह प्रकाश की राह छोड़,अंधकार की ओर बढ़ जाता है।इसलिए लग जाओ अपने कर्म में,स्वयं का लो तुम संग्यान।मेहनत से बढ़ाओ अपना ज्ञान,भटकने मत दो अपना ध्यान।समय की बर्बादी कर देगी तुम्हें बर्बाद,इसलिए कुछ बनने की ठान।आलस्य को भगाओ अपने से कोसों…

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मातृ भाषा

हमारी मातृ भाषा है हमारी जान है हिन्दी।सदा हम पूजते इसको हमारा मान है हिन्दी।। सुता यह देववाणी की बड़ी भाषा सभी से है।लिए भण्डार शब्दों का विपुल ये ज्ञान है हिन्दी।। करो सम्मान सब इसका उठाके शीश को अपने।सुनो हिन्दी कहो हिन्दी हमारी शान है हिन्दी।। सहज सा रूप है इसका लिए ये भाव…

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