ग़ज़ल : डा. अफ़रोज़ आलम- कुवैत
अत्तार के मस्कन में ये कैसी उदासी है सोने की मुक़ाबिल में हर सम्त ही मिट्टी है तू साहब-ए-क़ुदरत है तू अपना करम रखना सहरा की तरफ़ माइल हालात की कश्ती है रौशन है दरख़्शाँ है ये दौर ब-ज़ाहिर तो मज़दूर के बस में तो बस रीढ़ की हड्डी है लम्हों की तआ’क़ुब में सदियों…
