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वही सच्चे मजदूर हैं

एक व्यक्ति अपने गाँव से एक किलोमीटर दूर, पहाड़ों की तलहटी में जाकर बार-बार हथौड़ा उठाता है, और पूरी ताकत से पत्थर पर प्रहार करता है। पत्थर को तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटता है, उन्हें वर्गाकार आकार देता, दोनों हाथों से उलट-पलट चौकोर शिला-खण्ड सजाता है— तब जाकर मिलती है मजदूरी, जिससे चलता है उसका…

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फागुन लाया रंग की बौछार

फागुन लाया रंग की बौछार भरी पिचकारी गुलाबी हरी लाल टेसू  फूल भरी नारंगी थाल खेतन सजे सरसों पीला हार । सिया राम सब रंगे गुलाल खेले जन अवध प्रभु निहारसरयू किनारे लंबी कतार ढोल नगाड़े मृदंग झंकार। कान्हा पर हुई फूलों की बरसात ग्वाल बाल सखियां राधा का भरा प्यारछेड़खानी लठियन  लड्डूअन न्योछार मची ब्रज धूम होली त्यौहार। काशी में भोले…

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ठिठौली :  निशा भास्कर 

लट लटकानी डोले गाल पर गुजरिया  जरा सुलझा दो मनमोहन साँवारियाँ।  चुनर हटाए वेणी खोले रे बावरिया। सुध बिसराई राधा बाजे जब बाँसुरियां। लट सुलझाते कान्हा खोई रे मुंदरियां  गुंज माल छिन्न भई भरी रे डगरिया। बाँधी भाव बंधन में हार पहिरावै राधा  सखियन ढूँढें अपने प्यारे की मुंदरियां।  मुदित मलंग कंठ बोली ललिता सखी …

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तब कविता कुछ कहती है

व्यथा से मन की उर्वर भूमि में भावो का रोपण होताकरुणा संग सींचा जाता शब्दों सेतब कविता कहती है। वेदना के स्वर पत्थरों पर गुजर कर पिघला देतेरस की धारा बहती कलम चलती तब कविता कहती है। हृदय की टीस आंसुओं से ना निकल कर कलम सेकरुणावर्षा होती धरा के आंचल तब कविता कहती हैं।…

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परीक्षा से आगे सोचना होगा: शिक्षा का असली मकसद – डॉ विजय गर्ग

  आज के दौर में ‘शिक्षा’ और ‘परीक्षा’ एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। जैसे ही बच्चा स्कूल में कदम रखता है, उसके सीखने की यात्रा अंकों और ग्रेड्स की दौड़ में बदल जाती है। लेकिन क्या जीवन की सफलता केवल उत्तर पुस्तिकाओं में लिखे गए शब्दों तक सीमित है? समय आ गया है कि…

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कहानी : रिश्तों की जड़ें

परिवार बड़ा था, घर पुश्तैनी और उसमें ज़िम्मेदारियाँ सबसे भारी। इसी भार को अपने कंधों पर उठाकर संजय ने एक दिन वह निर्णय लिया, जिसने उसके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। पुश्तैनी दुकान, बूढ़ी माँ, पत्नी और दो छोटे बच्चे, सबको पीछे छोड़कर वह विदेश चला गया। परदेश उसका सपना नहीं था, मजबूरी थी।…

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दर्द ए आरक्षण (सुनील शर्मा)

लोकतंत्र में राजतंत्र का ही पलड़ा भारी है!कोई भी हो सत्ताधारी वोटों का व्यापारी है!!रोजगार के चक्कर में सड़कों पर युवा भटकते हैं!जब भी हक की बात करो आंखों के बीच खटकते हैं!!पढ़ लिख कर जो ख्वाब थे देखें सारे चकनाचूर हुए!कुछ आरक्षण की चक्की में पीसने को मजबूर हुए!!राजतंत्र के आगे देखो लोकतंत्र ही…

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अ से ज्ञ अलंकृत अनुप्रास  

‌अरुणोदय लालिमा अम्बर पथ  सोहेअवनि अंशुमय अंर्तमन मोहे | आभूषित आभामंडल आकाशदीप राशि मेंआध्यात्मिक मन आनंदित आलोकित काशी में | इन्दु रश्मिमयी धरा पुलकित इन्दिवर मन मोहेईश पूजन चली सखियां इंगुर श्रृंगार सोहे | उषाकाल लालिमा भरी क्षितिपथ धरणी उमंगउदित भानु उत्पल खिला उद्यान पुष्प बहुरंग | ऋत्विक ऋजु मनिषी श्रेष्ठ सर्वदाऋषि तप भूमि तट…

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शीर्षक-लघु व्यंग  झूले के संग

कुछ दिन पहले तीज पार्टी में एक एक सखी  ने स्टिकर डाला था जिसमें झूला झूलते हुए आनंद लेते हुए  मुझे वह दिन याद आ गए बचपन के  दिन जब मैं स्कूल में झूला पंगे डाल डाल कर झूलती थी । हमारा स्कूल में एक झूला विशालकाय था जिसमें तीन तीन झूले थे .लंच के…

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“उलझन”

शाम का समय,आकाश में बादल छाये  हुए थे, हवा तेज चल रही थी और मौसम भी जाड़े का। लोग अपनी-अपनी रजाई में दुबके पड़े गर्म चाय का आनन्द ले रहे थे। सरिता चाय के साथ ही साथ कुछ इधर उधर की बातें भी कर रही थी तभी बगल वाले अजय जी की बातें होने लगीं।…

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