
गृह और किसी अन्य ग्रह का दृश्य एक जैसा कैसे हो सकता है ? ग्रह पर जोखिम बहुत है।
अगर हमारी फ्लाइट या ट्रेन की समय-सारिणी बदल जाती है, तो हम एक प्रकार से एयरपोर्ट अथवा स्टेशन पर फंस जाते हैं और हम इन क्षणों में बेचैनी और हताश से भर जाते हैं। सोचिये क्या होगा जब आपकी नियोजित आठ दिन की अल्प अवधि की अंतरिक्ष यात्रा अनावश्यक रूप से नौ महीने तक बढ़ जाती है, क्योंकि वापसी की उड़ान अंतिम क्षण में रद्द हो जाती है? सुनीता विलियम्स और बैरी “बुच” विल्मोर के साथ ऐसा ही कुछ हुआ और वे नौ महीने से अधिक की अवधि के बाद के बाद धरती पर आ सके। इनकी हिम्मत और हौसले से सबक लेना चाहिए। हमें मेहनत, हिम्मत, धैर्य रखकर अपने सभी काम करने चाहिए। असफलताएं बेशक हमारे रास्ते में बाधा डालने की कोशिश करें। हमारे देश में चंद्रयान-3 को संचालित करने में हमारे देश की महिला वैज्ञानिक और इंजीनियर ने भी इसकी सफलतापूर्वक लैंडिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसने उन लोगों को आइना दिखाया था जो बेटियों को कमजोर समझते हैं।
ऐसा नहीं है कि यह अंतरिक्ष में किसी अंतरिक्ष यात्री द्वारा बिताया गया सबसे लंबा समय है। यह रिकॉर्ड लंबे समय से रूसी अंतरिक्ष यात्री, वैलेरी पॉलीकोव के पास है, जो 1994 में मीर अंतरिक्ष स्टेशन में लगभग सवा साल तक रहे थे, लेकिन वह एक योजनाबद्ध मिशन था। अधिकांश अंतरिक्ष मिशन इतने लंबे समय तक नहीं चलते हैं, क्योकिं जोखिम बहुत है। नौ महीने से सुनीता विलियम्स और बैरी “बुच” विल्मोर की वापसी पर बड़ा प्रश्न चिह्न लगा हुआ था और अतरिक्ष स्टेशन की खिड़की से अंतरिक्ष को दिखने वाले और भी अधिक गहरी चिंता में थे। केवल तस्वीरों और वीडियो क्लिप के माध्यम से पृथ्वी वासियों के सामने सुनीता और बैरी के कष्टों और पीड़ाओं को दिखाया गया, जिससे लगभग सभी की आँखें परिक्रमा करने वाले अंतरिक्ष स्टेशन पर टिकी हुई थी।
कोई भी पूछ सकता है, “कौन से कष्ट?, कौन-सी पीड़ाएं?” खासकर वे लोग जो इससे अनभिज्ञ हैं। इससे पहले कि आप अंतरिक्ष स्टेशन के अंदर जीवन को एकांत में छुट्टी के रूप में सोचना शुरू करें, शानदार दृश्य वाले कमरों में आराम करना, अंतरिक्ष स्टेशन में महीनों बिताने की दुर्दशा पर विचार करना दोनों भिन्न बातें हैं। क्या गृह और किसी अन्य ग्रह का दृश्य एक जैसा हो सकता है , गृह जहाँ सुखदायक होता है, वहीं कोई अन्य ग्रह लगातार कष्टदायक स्थिति में डालता है। जैसा कि हाल ही में बुकर पुरस्कार विजेता सामंथा हार्वे ने अपने उपन्यास ऑर्बिटल में वर्णित किया है कि अंतरिक्ष यात्री अक्सर नीले ग्रह पर दूसरी नज़र डालते हैं, यह जांचने के लिए कि पृथ्वी और उसके समुद्र केवल सपने या मृगतृष्णा नहीं हैं। कुछ लोगों ने इस “प्रक्षेपण प्रभाव” को एक प्रेरणादायक दृश्य के रूप में वर्णित किया है, जो अंतरिक्ष यात्रियों के मनोबल और नाजुक मानवता के बंधन को मजबूती प्रदान करता है।
भले ही कोई फंसे होने के गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव को नजरअंदाज कर दे, जिसे इन दोनों अन्तरिक्ष यात्रियों ने बहुत सघनता से किया भी। लेकिन पहली बात विज्ञान यह कहता है कि शरीर पर शून्य गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव बहुत गहरा पड़ता है, जबकि अंतरिक्ष यात्रियों को शून्य गुरुत्वाकर्षण स्थितियों के तहत काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। प्रकृति ने मानव शरीर को काफी लंबे समय तक ऐसा करने के लिए डिजाइन नहीं किया है। हम अपने दैनिक जीवन में इसका एहसास नहीं करते हैं, लेकिन गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव हमारी हड्डियों के रखरखाव के लिए महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, अंतरिक्ष में शरीर को सहारा देने के लिए हड्डियों का इतना मजबूत होना ज़रूरी नहीं है। और इसलिए नई अस्थि कोशिकाएँ सामान्य दर पर नहीं बन पाती हैं। इससे धीरे-धीरे हड्डियों का घनत्व कम होता जाता है। अंतरिक्ष यात्रियों के लौटने के बाद इसके घातक परिणाम देखने को मिलेंगे। और यह क्षति अपूरणीय है, इसकी कोई भरपाई नहीं है। हृदय सहित शरीर में हर जगह की मांसपेशियाँ भी शोष (सूखने की क्रिया) से पीड़ित होती हैं। गुरुत्वाकर्षण की अनुपस्थिति में हमारे रक्त का संचार भी बदल जाता है। सिर को शरीर के अन्य हिस्सों से ज़्यादा रक्त मिलता है। इससे रक्त की मात्रा कम हो जाती है और थक्के बनने की संभावना बढ़ जाती है। सिर्फ़ रक्त ही नहीं, बल्कि सिर में अन्य तरल पदार्थ भी जमा होते जाते हैं। अंतरिक्ष यात्रियों को लगातार सर्दी जैसा महसूस हो सकता है। तरल पदार्थ के जमा होने से अंतरिक्ष यात्रियों की आँखों की पुतलियों का आकार भी विकृत हो जाता है, जिससे उनकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि वापस लौटने पर उन्हें चलने में कठिनाई होगी, उनकी आँखों की रोशनी कमज़ोर होगी और अक्सर उन्हें चक्कर भी आएंगे। कोई यह कह सकता है कि अंतरिक्ष स्टेशन में लगातार सर्दी लगने का एहसास होना अच्छी बात है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वहाँ की बदबू के बारे में कुछ भी नहीं लिखा जा सकता। जरा एक ऐसे कमरे की कल्पना करें, जिसे एक अरसे से खोला नहीं गया हो। अंतरिक्ष यात्रियों कि दयालुताओं और त्याग के लिए हम सभी को उनका आभारी होना चाहिए। उनका त्याग किसी भी उच्च से उच्च श्रेणी के तपस्वी से बड़ा है, महान है।
दूसरी बात यह कि अंतरिक्ष में उच्च ऊर्जा कणों (हाइ एनर्जी पार्टिकलस) के संपर्क में आने का खतरा है। पृथ्वी पर, हम मैग्नेटोस्फीयर ( यह वह गुहा है जिसमें पृत्वी स्थित है और सूर्य के प्रभाव से सुरक्षित रहती है) के आवरण से सुरक्षित हैं और सूर्य और गहरे अंतरिक्ष से आने वाले इन कणों के हानिकारक प्रभाव को हमारे ऊपर से कम करती है। भू-चुंबकीय क्षेत्र में भी कण फंसे हुए हैं। जबकि शरीर पर ऐसे कणों की बमबारी से निश्चित रूप से कैंसर की संभावना बढ़ जाती है, खासकर अंतरिक्ष में चलने के दौरान, इस प्रभाव की सीमा को अभी तक मापा नहीं गया है। यह वर्तमान मिशन के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, खासकर इसलिए क्योंकि सुनीता विलियम्स ने इतिहास में किसी भी अन्य महिला की तुलना में अधिक अंतरिक्ष में चलने के घंटे बिताए हैं। वैज्ञानिक एक अरसे से अंतरिक्ष में विकिरण जोखिम की समस्या के बारे में चिंतित हैं, लेकिन अभी तक कोई “केस स्टडी” नहीं है। मंगल या चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को लंबे समय के लिए भेजने की योजना बनाने से पहले इस विकिरण जोखिम की समस्या को कुछ हद तक हल करना होगा। विलियम्स और विल्मोर इस संबंध में भविष्य के अध्ययनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वैज्ञानिक भविष्य में इन सभी अध्ययनों की योजना बन सकती है। यह समय है कि इस जोड़ी की सुरक्षित वापसी का जश्न मनाया जाए, न केवल दोनों अंतरिक्ष यात्रियों के लिए, बल्कि बचाव अभियान में शामिल सभी लोगों की दृढ़ता और धैर्य ने यह सुनिश्चित किया है कि कहानी का सुखद अंत हो। सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में थीं, लेकिन उनका मन धरती पर था। तकनीकी खराबी के कारण उनकी वापसी में देरी हो गई। 9 महीने अकेले रहना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हर दिन उन्होंने खुद को मजबूत बनाए रखा और अंतरिक्ष में अपना शोध जारी रखा। इधर जमीन पर लोग उनकी बहादुरी के किस्से सुन रहे थे। उन्होंने धैर्य, साहस और आत्मविश्वास से दुनिया को सिखाया कि कठिनाइयों के आगे झुकना नहीं चाहिए—अगर मन में दृढ़ निश्चय हो, तो कुछ भी असंभव नहीं।
हम भूले नहीं हैं कि इससे पहले भी भारतीय मूल की बेटी कल्पना चावला ने अंतरिक्ष में कदम रख अपने माता-पिता के साथ भारत का मान दुनियाभर में बढ़ाया था। कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय महिला थी। यह बताता है कि हमें बेटियों को कमजोर नहीं समझना चाहिए, उन्हें भी बेटों की तरह अपने करियर बनाने के मौके देने चाहिए। और पढ़ा-लिखा कर इन्हें भी अपने पैरों पर खड़े होने देना चाहिए, ताकि वे जिंदगी में कभी पढ़ाई न करने के कारण निराश महसूस ना करें और मन ही मन अपने माँ-बाप को ना कोसें। इससे सभी लड़कियों को भी यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि अगर आपके माता-पिता आपको पढ़ाने के लिए दिलचस्पी दिखा रहे हैं तो उनके सपनों को साकार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़नी चाहिए। और अपनी कामयाबी के झंडे गड़ाने चाहिए। विद्यार्थी जीवन का समय, जोकि जिंदगी का गोल्डन पीरियड (स्वर्ण काल) होता है, उसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।
– डॉ. मनोज कुमार
लेखक – हरियाणा सरकार में जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।