
मृत्यु एक अटल सत्य है, लेकिन ऐसे कम ही होते हैं जो शोषितों के अधिकारों और न्याय के लिए संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए किसी भी बलिदान के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसे ही एक योद्धा लक्ष्मण दास/माधोदास (बाबा बंदा सिंह बहादुर) का जन्म 27 अक्टूबर 1670 को राजौरी (जम्मू-कश्मीर) में राम देव के घर हुआ था। शिकार के दौरान घायल हुई हिरणी और उसके गर्भ में तड़प-तड़प कर मरते बच्चों के भयावह दृश्य ने माधोदास के जीवन में बड़ा बदलाव ला दिया। एक तपस्वी का जीवन जीने के लिए वे नांदेड़ के जंगलों में गोदावरी नदी के किनारे चले गए और वहीं डेरा डाल दिया, लेकिन 1708 में दसवें गुरु गोविंद सिंह से मिलने और पंजाब की धरती पर हो रहे जुल्म की कहानी सुनने के बाद उनका खून खौल उठा। वे हर तरह के जुल्म से लोहा लेने को तैयार हो गए। अमृत पान के पश्चात वे माधोदास से बंदा सिंह बहादुर बन गए तथा गुरु गोबिंद सिंह से शपथ लेकर दमन की आंधी को दबाने के लिए कुछ वीर सिख योद्धाओं के साथ पंजाब की ओर कूच कर गए। उस समय के पंजाब में प्रवेश करते ही बाबा बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में मुट्ठी भर सिख सेना ने सोनीपत, समाना, मुस्तफाबाद, साढौरा, मलेरकोटला तथा नाहन की मुगल चौकियों को परास्त कर पंजाब के सीस-सतलज क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर ली।
‘साका सरहिंद’ केवल सिख इतिहास का ही नहीं, बल्कि विश्व के इतिहास का एक काला पन्ना बन चुका है। गुरु गोबिंद सिंह के छोटे पुत्रों बाबा जोरावर सिंह, बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी पर ढाए गए जुल्मों का बदला लेने के लिए बाबा बंदा सिंह बहादुर ने मुगल साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी। 12 मई, 1710 को उन्होंने चप्पड़चिड़ी के युद्ध में सरहिंद हत्याकांड के मुख्य दोषियों वजीर खान तथा दीवान सुच्चा नंद को मारकर सरहिंद पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उन्होंने किसानों को जमींदारों से मुक्त करने के लिए एक विशेष आदेश जारी किया ताकि भूमि का स्वामित्व खेतिहर मजदूरों को सौंपा जा सके। मजदूरों को भूमि का स्वामित्व अधिकार देकर और जाति/धर्म आदि की भावनाओं से ऊपर उठकर उन्हें लोगों की गरिमा के रक्षक के रूप में भी जाना जाता है। चूंकि बंदा सिंह बहादुर की सोच और कार्य सांप्रदायिकता से ऊपर थे, इसलिए उन्हें शांतिप्रिय हिंदुओं और मुसलमानों का पूरा समर्थन मिलने लगा। खालसा की महिमा सहारनपुर और जलालाबाद, जालंधर, बटाला, कलानौर और अमृतसर के यमुना, गंगा और दोआब के इलाकों में भी गूंजने लगी। बाबा बंदा सिंह बहादुर के प्रभावशाली रूप, महान चरित्र, न्याय के लिए लड़ने और शोषितों को सुधारने के उनके मिशन (धर्म युद्ध) ने लोगों पर जादुई प्रभाव डाला। न्याय प्रिय लोग सिख सेना के साथ लड़ने और मरने के लिए तैयार हो रहे थे।
सन् 1713 में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने गुरदास नंगल को अपनी राजधानी बनाया और एक कुशल और न्यायपूर्ण राज्य की नींव रखकर खालसा राज्य को चलाने पर ध्यान केंद्रित करने के प्रयास शुरू किए। उनके जन कल्याणकारी प्रयासों से जन आंदोलन की गति चल रहे धार्मिक युद्ध की ओर बढ़ने लगी। जिससे उत्पीड़ित शासक घबरा गए। उन्हें उत्पीड़ितों पर किए गए अत्याचारों का हिसाब देने का समय निकट आता दिखाई देने लगा।
मुगल बादशाह फर्रुखसियर और उसके सरदारों ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के खालसा राज्य की स्थापना के प्रयासों को कुचलने के लिए एक बड़ी भारी सेना भेजने का फैसला किया। लाहौर के गवर्नर अब्दुल समद खान ने इस सेना की कमान संभाली और बाबा बंदा सिंह बहादुर का पीछा करते हुए गुरदास नंगल पर हमला कर दिया। जब मुगल सेना सिख सेना द्वारा छेड़े गए भीषण युद्ध का सामना नहीं कर सकी, तो मुगल शासकों ने गुरदास नंगल किले की घेराबंदी कर दी। इतिहास गवाह है कि यह भीषण युद्ध लगभग दस महीने तक चला। किले की घेराबंदी होने और राशन-पानी खत्म होने के बावजूद खालसा सेना दुश्मन को बुरी तरह कुचल रही थी। आखिर में भूख-प्यास से शारीरिक रूप से कमजोर खालसा सेना पर मुगल सेना भारी पड़ी और दिसंबर 1715 में बंदा बहादुर, उसके करीब 740 साथी और उसका तीन साल का बेटा अजय सिंह गिरफ्तार कर लिए गए।
इतिहासकार बताते है कि गिरफ्तार सिख कैदियों को 27 फरवरी, 1716 को दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित अगराबाद गांव में ले जाया गया। आम लोगों में साम्राज्य का आतंक और डर पैदा करने के लिए दिल्ली में इन कैदियों का जुलूस निकाला गया। अगराबाद गांव से शुरू होकर यह जुलूस 10 किलोमीटर दूर लाल किले तक ले जाया गया। इस दौरान दो हजार सिखों के सिर काटकर उनमें भूसा भरकर ले जाया गया। उनके सिर के बाल खुले रखे गए ताकि लोग पहचान सकें कि ये वाकई सिखों के सिर हैं। इनकी संख्या बढ़ाने के लिए कुछ महिलाओं के भी सिर काटे गए। उनके पीछे एक हाथी था, जिस पर एक पिंजरे में बाबा बंदा सिंह बहादुर कैद थे। उनके सिर पर तीन-चार किलो मिट्टी से भरा एक लकड़ी का नाँद था, जिसके भार से वे गर्दन टेढ़ी करके बैठे थे। यद्यपि बाबा बंदा सिंह बहादुर पिंजरे में कैद थे, लेकिन उनके पीछे एक सिपाही हाथ में नंगी तलवार लिए खड़ा था। हाथी के पीछे 740 कैदी थे। उनके प्रत्येक हाथ को उनकी गर्दन के पीछे बेड़ियों में कसकर बांध दिया गया था। उनके सिर पर कागज़ की टोपियां रखी गई थीं और उनके शरीर पर भेड़ की खाल लपेटी गई थी ताकि सिख कैदियों को अपमानित किया जा सके। उन्हें बिना काठी वाले ऊँटों पर जोड़े में लाद दिया गया था। मुगल सेनापति मुहम्मद अमीन खान, उनके बेटे कमर-उद-दीन खान और ज़कारिया खान के बेटे अब्दुस समद खान इस जुलूस के पीछे चल रहे थे। यह जुलूस लाहौरी गेट से होकर दिल्ली शहर में दाखिल हुआ। जब बाबा बंदा सिंह बहादुर को मुगल बादशाह फर्रुखसियर के सामने पेश किया गया, तो उन्होंने बाबा बंदा सिंह बहादुर से पूछा, ‘आप अपने लिए किस तरह की मौत चुनेंगे?’ इस पर बाबा बंदा सिंह बहादुर ने बड़ी हिम्मत और समझदारी से कहा कि एक राजा अपनी मौत के लिए जिस तरह की मौत चाहता है, वह मौत होनी चाहिए। लेकिन मुगल तानाशाह ने मानवता की सभी हदें पार करते हुए पहले तो गिरफ्तार सिख सैनिकों का क्रूर कत्लेआम किया और फिर बाबा बंदा सिंह बहादुर का मनोबल तोड़ने के लिए उनके सामने ही उनके बेटे अजय सिंह का कॉलर खींचकर बाबा बंदा सिंह बहादुर के मुंह में ठूंसने की कोशिश की। मौत से बेखौफ होकर उन्होंने अपने सिख धर्म पर अडिग रहते हुए हर तरह की अमानवीय यातनाएं सहन कीं और 309 साल पूर्व 25 जून, 1716 को बेमिसाल शहादत हासिल की।
हरियाणा सरकार वर्तमान में बाबा बंदा सिंह बहादुर की स्मृति में लोहगढ़ में स्मारक बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। सरकार की सात्विक मंशा से पता चलता है कि वह हरियाणा में महापुरुषों की यादों को जनमानस के स्मृति पटल पर अंकित करना चाहती है ताकि हमारा समाज गर्व कि अनुभूति कर सके और जान सके कि हमारे महापुरुषों ने कितने बलिदान दिए हैं। 25 जून, 2025 को बाबा बंदा सिंह बहादुर लोहगढ़ फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा गुरू नानक खालसा कॉलेज यमुनानगर में बाबा बंदा सिंह बहादुर के 309 वें शहीदी दिवस के अवसर पर, उनके जीवन और विरासत पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में पूर्व कैबिनेट मंत्री कंवर पाल, मुख्यमंत्री के ओएसडी प्रभलीन सिंह, मुख्य वक्ता एवं इतिहासकार डॉ. सुखदयाल सिंह सहित अन्य सभी ने वक्ताओं ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के जीवनी, विरासत तथा इतिहास के बारे विस्तृत जानकारी प्रदान की। कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. प्रतिमा शर्मा ने इस कार्यक्रम के उत्साह के चलते बेहतरीन इंतजाम किये थे। इस रोज यमुनानगर जिले में 60 से 100 मिली मीटर की बारिश के बावजूद बड़ी संख्या ने लोग आये थे।
*- डॉ. मनोज कुमार*
*लेखक- जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।*
