हर एक मिनट का हिसाब रखती, भागदौड़ भरी वर्तमान जीवनशैली में सबसे बड़ी और लगातार उभरती हुई समस्या है हमारा स्वास्थ्य। प्रतिदिन के तनाव से उपजती और मौत के मुंह में ले जाती गंभीर बीमारियों को देखते हुए “शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्”

यह संस्कृत सूक्ति बिल्कुल सही साबित होती है। जिन्हें हमारे समाज में अक्सर बिना सोचे-समझे ‘पागल’ ‘या ‘अलग’ कहकर किनारे कर दिया जाता है, जिन्हें देखकर लोग मुंह मोड़ लेते हैं, जिनकी क्षमताओं को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, जिन्हें लोग इंसान नहीं, बल्कि चलती-फिरती ‘समस्या’ मानते हो उनको लेकर सितारे जमीन पर एक बेहतरीन और दिल को छू लेने वाली फिल्म बनी है। असल में, इस तरह के सिनेमा की शुरुआत चार्ली चैपलिन ने की थी। वो समाज की कड़वी सच्चाइयों और गंभीर मुद्दों को भी ह्यूमर के साथ दुनिया को दिखाते थे। सोचिए, एक गंभीर बात पर भी लोग हंसें और फिर उस हंसी के पीछे छिपी सच्चाई को समझें यही तो असली जादू है। वर्ष 2007 में ‘तारे जमीन पर’ फिल्म ने डिस्लेक्सिया जैसे जटिल लेकिन जरूरी विषय को एक संवेदनशील दृष्टिकोण को सामने रखा था। अब ‘सितारे जमीन पर’ उसी सोच को आगे बढ़ाते हुए हमें यह अहसास दिलाती है कि जिन्हें हम ‘मंगोल’ या पागल कहते हैं, दरअसल वो हमें इंसानियत का असली मतलब सिखाते हैं। ‘सितारे जमीन पर’ भी इसी कड़ी में जुड़ी शानदार फिल्म है। फिल्म एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर बात करती है। विषय है समाज में डाउन सिंड्रोम के पूर्वाग्रहों को तोड़ना। ‘डाउन सिंड्रोम’, जिसे ट्राइसॉमी 21 भी कहा जाता है, एक आनुवंशिक स्थिति है जो तब होती है जब किसी व्यक्ति के शरीर की कोशिकाओं में गुणसूत्र 21 की एक अतिरिक्त प्रति होती है। जीन हमारे सभी वंशानुगत लक्षणों के लिए ज़िम्मेदार कोड रखते हैं और छड़ जैसी संरचनाओं में समूहित होते हैं जिन्हें गुणसूत्र कहते हैं। सामान्य तौर पर प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं, यानी कुल 46। डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्ति में 21वें गुणसूत्र की एक अतिरिक्त प्रति होती है, जिससे कुल 47 गुणसूत्र हो जाते हैं। यह अतिरिक्त गुणसूत्र बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है। सितारें जमीन पर प्रस्तुत फिल्म ने समाज में मौजूद पूर्वाग्रहों और भेदभाव को हास्य और इंसानी जुड़ाव के माध्यम से तोड़ा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि इन्हें अबनॉर्मल या स्पेशल ट्रीटमेंट देने के बजाय सामान्य तरीके से ट्रीट किया जाए। प्रस्तुत फिल्म के जरिए न्यूरो-डायवर्जेंट (विशेष रूप से डाउन सिंड्रोम से जूझ रहे) युवाओं की कहानी दिखाई गई है। हालांकि यह फिल्म स्पैनिश मूवी चैंपियंस का अडॉप्टेशन है।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है इसकी कास्टिंग, जिसमें असल जिंदगी के डाउन सिंड्रोम से पीड़ित दस वयस्कों को बतौर अभिनेता लिया गया है। अभिनय से उनकी मासूमियत, नटखटपन और इंसानियत निश्चय ही हमारे चेहरे पर मुस्कान लाने में सफल हुई है।
सबका अपना-अपना नॉर्मल होता हैयही एक लाइन फिल्म ‘सितारे जमीन पर’ के मूल विचार को खूबसूरती से समेट लेती है। गत सप्ताह मुझे मेरे विद्यालय के दिव्यांग छात्रों एवं स्टाफ सदस्यों के साथ जिनमें हमारी प्रधानाचार्या भी शामिल थी इन सबके साथ प्रस्तुत फिल्म को देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। विशेष छात्रों में एक नई सकारात्मकता व विशेष ऊर्जा का संचार हुआ। अत: हमेशा खुद पर भरोसा रखें कि आप हर समस्या का हल निकाल कर सफलता जरूर पाएंगे और खुद को विश्वास दिलाएं की आप हार को जीत में बदलने की क्षमता रखते हैं इससे आपमें आत्मविश्वास बढ़ेगा और आप ज्यादा ऊर्जा से काम को अंजाम देंगे।
निष्कर्ष रुप मे यह कहना सार्थक होगा कि डाउन सिंड्रोम एक सामान्य आनुवंशिक स्थिति है, और इसके बारे में जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
ये फिल्म आपको हंसाएंगी, आपको रुलाएगी, और सबसे बढ़कर, आपके नजरिए को बदल देगी।‘सितारे जमीन पर‘ आपको सिखाएगी कि ‘नॉर्मल’ क्या है, ये सवाल खुद से पूछो, दूसरों से नहीं।
लेखिका – मोनिका शर्मा
विशेष शिक्षा प्राध्यापिका – दिल्ली
