लघुकथा
डॉक्टर ने कहा —
“आपके पास बस छह महीने हैं।”
रवि थोड़े दर्द के साथ, पर हल्के से मुस्कुराकर बोला —
“छह महीने…? काफी हैं, जीने के लिए….”
घर लौटते ही उसने अपनी टू-डू लिस्ट जला दी —
वो लिस्ट; जिसमें प्रमोशन, नया घर, कार और सामाजिक प्रतिष्ठा दर्ज़ थी।
अब वो हर सुबह बच्चों के साथ पार्क में जाकर हँसता; खेलता,
पत्नी के साथ आराम से चाय की चुस्की भरता,
रोज़ रात माँ से बातें करते हुए उनके पैर दबाता।
और इतना ही नहीं —
अपने पुराने पेंट ब्रश से अधूरी पेंटिंग्स भी पूरी करने लगा।
एक दिन अस्पताल में डॉक्टर ने पूछा —
“अब कैसा लग रहा है?”
रवि मुस्कराया —
“पहली बार जीने जैसा लग रहा है।”
छह महीने पूरे हुए — पर मौत तो हाथताली दे कर निकल गई…
डॉक्टर चकित थे।
इस बार दर्द से नहीं, बल्कि ख़ुशी के आँसू बहाते हुए हल्का-सा मुस्कुराकर रवि बोला —
*“शायद जब जीवन की चौड़ाई और गहराई बढ़ जाती है,*
*तो लंबाई अपनेआप साथ आ जाती है।”
* आरती परीख
