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क्या आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक होना चाहिए?

संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 क्या गारंटी देते हैं? औपचारिक और वास्तविक समानता में क्या अंतर है? क्या आरक्षण अवसर की समानता या निरंतरता के विचार में एक अतिरिक्त प्रावधान है? क्या आरक्षण के लाभ केवल ओबीसी, एससी और एसटी तक ही सीमित हैं? समतलीकरण के लिए आरक्षण ही क्यों जरूरी है?

अनुच्छेद 15 और 16 राज्य द्वारा की जाने वाली किसी भी कार्रवाई (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश सहित) और सार्वजनिक रोजगार में क्रमशः सभी नागरिकों को समानता की गारंटी देते हैं। जनसंख्या में पिछड़े वर्गों के अनुपात को दर्शाने के लिए आरक्षण प्रतिशत को न्यायिक सीमा 50% से आगे बढ़ाने की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। अवसर की समानता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और आरक्षण में 85% तक की वृद्धि को इस अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है। फिर भी, वंचितों के उत्थान के लिए सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से वास्तविक समानता की अत्यंत आवश्यकता है।

अब तक की कहानी

बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने घोषणा की है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो उनका गठबंधन आरक्षण को बढ़ाकर 85% कर देगा। एक अन्य घटनाक्रम में, सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के बीच आरक्षण के लिए ‘क्रीमी लेयर’ जैसी ‘व्यवस्था’ लागू करने की मांग वाली एक याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।

संवैधानिक प्रावधान क्या हैं?

अनुच्छेद 15 और 16 राज्य द्वारा किए जाने वाले किसी भी कार्य (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश सहित) और सार्वजनिक रोजगार में सभी नागरिकों को समानता की गारंटी देते हैं। सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, ये अनुच्छेद राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), SC और ST के उत्थान में भी सक्षम बनाते हैं। केंद्रीय स्तर पर आरक्षण के संबंध में महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का संक्षिप्त सारांश बाक्स में दिया गया है। वर्तमान में केंद्र में आरक्षण इस प्रकार है: ओबीसी (27%), एससी (15%), एसटी (7.5%) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10%, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान में कुल आरक्षण 59.5% है। विभिन्न राज्यों में आरक्षण का प्रतिशत उनकी जनसांख्यिकीय स्थिति और नीतियों के अनुसार भिन्न होता है।

अदालतों ने क्या निर्णय दिया है?

यह मुद्दा समानता के दो स्पष्ट रूप से परस्पर विरोधी पहलुओं – औपचारिक और वास्तविक – के कारण उत्पन्न होता है। बालाजी बनाम मैसूर राज्य (1962) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि अनुच्छेद 15 और 16 के तहत पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण ‘उचित सीमा के भीतर’ होना चाहिए और समग्र रूप से समुदाय के हितों के साथ समायोजित किया जाना चाहिए। न्यायालय ने आगे निर्णय दिया कि आरक्षण के ऐसे विशेष प्रावधान 50% से अधिक नहीं होने चाहिए। इसे औपचारिक समानता के समर्थन के रूप में देखा जाता है जहाँ आरक्षण को अवसर की समानता के अपवाद के रूप में देखा जाता है और इसलिए यह 50% से अधिक नहीं हो सकता।

दूसरी ओर, मूलभूत समानता इस विश्वास पर आधारित है कि औपचारिक समानता उन समूहों के बीच अंतर को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जिन्होंने अतीत में विशेषाधिकारों का आनंद लिया है और जो समूह ऐतिहासिक रूप से वंचित और कम प्रतिनिधित्व वाले रहे हैं। केरल राज्य बनाम एन एम थॉमस (1975) में सात न्यायाधीशों की खंडपीठ ने मूलभूत समानता के पहलू को उठाया है। इस मामले में अदालत ने कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण अवसर की समानता का अपवाद नहीं है, बल्कि उसी का दावा और निरंतरता है। हालांकि, चूंकि 50% की सीमा अदालत के समक्ष एक प्रश्न नहीं थी, इसलिए इसने मामले में इस पहलू पर बाध्यकारी निर्णय नहीं दिया।

इंदिरा साहनी मामले (1992) में, नौ न्यायाधीशों की पीठ ने ओबीसी के लिए 27% आरक्षण को बरकरार रखा। इस खंडपीठ ने कहा कि भारतीय संदर्भ में जाति वर्ग का निर्धारक है, न्यायालय ने ओबीसी के अंतर्गत क्रीमी लेयर को भी बाहर रखा। जनहित अभियान मामले (2022) में, न्यायालय ने 3:2 के बहुमत से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। न्यायालय ने माना कि आर्थिक मानदंड आरक्षण का आधार हो सकते हैं और यह भी कहा कि इंदिरा साहनी मामले में निर्धारित 50% की सीमा पिछड़े वर्गों के लिए थी, जबकि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 10% आरक्षण अनारक्षित समुदायों के एक अलग वर्ग के लिए है।

इसके विरोध में तर्क क्या है ?

डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने नवंबर 1948 में संविधान सभा में दिए अपने भाषण में उन पिछड़े समुदायों के लिए आरक्षण की आवश्यकता को उचित ठहराया था, जिन्हें अतीत में सदियों तक इससे वंचित रखा गया था। उन्होंने यह भी कहा था कि ‘अवसर की समानता’ के गारंटीकृत अधिकार को बनाए रखने के लिए आरक्षण केवल अल्पसंख्यकों तक ही सीमित होना चाहिए।

हालांकि, जनसंख्या में पिछड़े वर्गों के अनुपात को दर्शाने के लिए आरक्षण प्रतिशत को न्यायिक सीमा 50% से आगे बढ़ाने की मांग बढ़ती जा रही है। इस अनुपात के बारे में केवल अनुमान के बजाय वास्तविक आंकड़े प्राप्त करने के लिए जाति जनगणना की मांग ज़ोरदार रही है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि संसद में विभिन्न सरकारी उत्तरों के अनुसार, केंद्र सरकार में ओबीसी, एससी और एसटी के लिए आरक्षित 40-50% सीटें खाली रह जाती हैं।

एक अन्य विवादास्पद मुद्दा आरक्षण लाभों के संकेंद्रण से संबंधित है। ओबीसी जातियों के बीच उप-वर्गीकरण पर सिफारिशें देने के लिए गठित रोहिणी आयोग ने अनुमान लगाया है कि केंद्रीय स्तर पर 97% आरक्षित नौकरियाँ और शैक्षणिक संस्थानों में सीटें केवल लगभग 25% ओबीसी जातियों/उप-जातियों द्वारा प्राप्त की गई हैं।

ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत लगभग 2,600 समुदायों में से लगभग 1,000 का नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

आरक्षण लाभों के संकेंद्रण का एक समान मुद्दा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों में भी बना हुआ है। इन समुदायों के लिए ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर नहीं रखा गया है। पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह (2024) मामले में, सात न्यायाधीशों की पीठ के चार न्यायाधीशों ने केंद्र सरकार पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर रखने के लिए उपयुक्त नीतियाँ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। हालाँकि, केंद्र सरकार ने अगस्त 2024 में एक कैबिनेट बैठक में फिर से पुष्टि की कि क्रीमी लेयर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण पर लागू नहीं होता है।

जो आलोचक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए ‘क्रीमी लेयर’ के विस्तार का विरोध करते हैं, उनका तर्क है कि इन समुदायों के लिए रिक्तियां वैसे भी पूरी तरह से नहीं भरी जाती हैं। इसलिए, ऐसे समुदायों के भीतर ‘क्रीमी लेयर’ द्वारा और भी अधिक हाशिए पर पड़ी जातियों के अवसरों को हड़पने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह भी संभव है कि किसी भी मानदंड के आधार पर ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने से रिक्तियों का बैकलॉग और भी बढ़ जाएगा। यह भी आशंका है कि ऐसी बैकलॉग रिक्तियाँ आगे चलकर अनारक्षित सीटों में बदल सकती हैं, जिससे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को उनके उचित अवसरों से वंचित होना पड़ेगा। अथवा यह उनको वंचित किए जाने की सोची समझी राजनीतिक और एक विशेष मनोवृति वाले वर्ग की साजिश करार दी जाती है।

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

अवसर की समानता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और आरक्षण में 85% तक की वृद्धि को ऐसे अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है। फिर भी, वंचितों के उत्थान के लिए सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से ठोस समानता की आवश्यकता है। आगामी 2027 की जनगणना के अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर, जिसमें पिछड़ी जातियों की भी गणना की जाएगी, आरक्षण के उपयुक्त स्तर पर पहुँचने के लिए सभी हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा होनी चाहिए। जनगणना के आंकड़ों पर आधारित रॉबिनी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ओबीसी के बीच उप-वर्गीकरण को लागू करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एससी और एसटी के संबंध में, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष याचिका में मांग की गई है, द्वि-स्तरीय आरक्षण प्रणाली पर विचार किया जा सकता है। ऐसी योजना के तहत, उन समुदायों के अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों को शामिल करने से पहले, अधिक हाशिए पर रहने वाले वर्गों को प्राथमिकता दी जाएगी। ये उपाय यह सुनिश्चित करेंगे कि आरक्षण का लाभ आने वाली पीढ़ियों में वंचितों के बीच अधिक हाशिए पर रहने वाले लोगों तक पहुँचे।

यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों और हमारे देश की युवा आबादी को देखते हुए, आरक्षण की कोई भी योजना समाज के बड़े वर्ग की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाएगी। उपयुक्त कौशल विकास तंत्र प्रदान करने के लिए ईमानदार प्रयास होने चाहिए जो हमारे युवाओं को लाभकारी रोजगार प्राप्त करने में सक्षम बनाएं। और साथ साथ रोजगार के अवसरों को कम करने की बजाए उन्हें बढ़ाए जाने की दिशा में प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। ताकि अधिक से अधिक लोग इससे लाभान्वित हो सकें।

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आरक्षण का अब तक का सफ़र

केंद्रीय स्तर पर आरक्षण के संबंध में महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का संक्षिप्त सारांश

प्रमुख घटनाक्रम

वर्ष 1950 और 1951 – संविधान और प्रथम संशोधन का प्रारंभ – अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उत्थान के लिए अनुच्छेद 15 और 16 में प्रावधान लागू किया गया।

वर्ष 1982 – केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण क्रमशः 15% और 7.5% निर्धारित किया गया।

वर्ष 1990 – मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण की शुरुआत की गई।

वर्ष 2005 – 93वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 15(5) जोड़ा गया, जिससे निजी सहित शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण संभव हुआ।

वर्ष 2019 – 103वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 10% तक आरक्षण संभव हुआ। शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक रोजगार में अनारक्षित वर्ग के बीच ईडब्ल्यूएस श्रेणी का समावेश किया गया।

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  • डॉ.मनोज कुमार

लेखक – जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी हैं।

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