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धर्मो रक्षति रक्षितः बनाम अहिंसा परमो धर्म: ; इस विजयदशमी दोनों आमने – सामने

“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।”

लेख :- पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषणक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

 यह  वर्ष खास है क्यूंकि दो अक्टूबर गाँधी जयंती और दशहरा दोनों एक साथ है। एक अहिंसा का प्रतीक है तो दूसरा धर्म के विजय अर्थात  हिंसा का। इस विजयादशमी पर संघ के 100 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे, सन 1925 में विजयादशमी के दिन ही नागपुर में संघ की स्थापना हुई थी। इस वर्ष निकलने वाला पथ संचलन इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। शास्त्रों की पूजा विजयादशमी यानी दशहरे के दिन की जाती है. इस दिन भगवान राम की रावण पर विजय का उत्सव मनाया जाता है, और यह परंपरा राजा-महाराजाओं से चली आ रही है जो युद्ध और संघर्ष में विजय पाने के लिए अपने शस्त्रों की पूजा करते थे. विजयादशमी पर शस्त्र पूजन करने से जीवन में आने वाली परेशानियां और भय दूर होते हैं और शक्ति व विजय की कामना की जाती है। विजय की कामना: प्राचीन काल से ही राजा-महाराजा युद्ध में विजय प्राप्त करने और अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए शस्त्र पूजा करते थे. विजयादशमी के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ! यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है और हमें सच्चाई, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

कहा भी  गया है कि:

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

(अर्थात: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।) आइए, हम सभी अपने जीवन में धर्म, सत्य और न्याय के मूल्यों को अपनाएं और समाज में सौहार्द और समृद्धि की स्थापना करें। इस विजयादशमी पर आपके जीवन में विजय, शांति और समृद्धि का वास हो। शौर्य और सुरक्षा: यह पूजा शस्त्रों को पवित्र करती है, जिससे देश की रक्षा करने वाले, कानून का पालन करने वाले और शस्त्र का उपयोग करने वाले लोगों को शक्ति और सुरक्षा प्राप्त होती है। समृद्धि और कष्टों का अंत: दशहरे पर शस्त्र पूजन करने से व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता, कष्ट, शोक और भय का नाश होता है। सबसे पहले शस्त्रों पर जल छिड़क कर उन्हें पवित्र करें। शस्त्रों पर कुमकुम, हल्दी का तिलक लगाएं और फूलों से उनका श्रृंगार करें।धूप-दीप जलाकर महाकाली या दुर्गा का स्मरण करें। शस्त्रों को मीठा भोग लगाएं। शस्त्रों से शक्ति और सुरक्षा की कामना करें और जीवन के हर क्षेत्र में विजय के लिए प्रार्थना करें इस विजयादशमी- प्रश्न यह है कि अनेक विजय अभियान हुए, लेकिन भगवान राम का ही विजयोत्सव इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? इसका कारण यह है कि राम की विजय यात्रा में उनके सहायक वन की वानर और भालू जातियां थीं, अयोध्या से कोई सेना नहीं आई थी। केवल एक निर्वासित का उत्साह था, जिसने राक्षसों से आक्रांत साधारण लोगों में आत्मविश्वास भरा। विरथ होकर भी उन्होंने रथ पर आरूढ़ रावण के विरुद्ध युद्ध किया और विजय प्राप्त की। यह ऐसी विजय थी जिसमें राक्षसों का केवल पराभव नहीं हुआ, बल्कि रावण के अहंकार का संहार हुआ।”नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।” संघ शताब्दी वर्ष तथा विजयादशमी के पावन पर्व पर श्री राम शाखा जाजरदेवल बस्ती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित एकत्रीकरण में स्वयंसेवक बंधुओं के साथ सहभागिता की। इस बार 2 अक्टूबर को गांधी जयंती और दशहरा एक ही दिन है  मतलब एक तरफ रावण का दहन होगा, और दूसरी तरफ गांधी जी कहेंगे –

‘अहिंसा परमो धर्म: अब कन्फ्यूज़न ये है कि लाठी चलाये  या मुंह चलाएँ ! राम और श्रीराम  – सूर्य और चन्द्र का मर्यादित सामरस्य राम सूर्य हैं क्योंकि न तो सूर्य अपनी मर्यादा त्यागता है और न ही राम त्यागते हैं। राम या सूर्य अपनी मर्यादा त्याग दें तो कुछ बचेगा ही नहीं। इसीलिए राम आदर्श हैं।  राम निगम हैं। जैसे अपने आविर्भाव से अबतक वेद एक समान स्वर में पढ़े जाते हैं और उसमें न कुछ कम किया जा सकता और न मिलाया जा सकता है, ऐसे ही राम की मर्यादा है। श्रीराम  आगम हैं। जैसे आगम में नियम आदि से लेकर नाना प्रकार के भेद विभेद हैं वैसे ही श्रीराम  का व्यक्तित्व रहा है। श्रीराम ईश्वर हैं और परम शाक्त भी हैं। जैसे एक शाक्त परम योगी और भोगी दोनों एक साथ नहीं  हो सकता है, ऐसे ही  श्रीराम का चरित्र है। राम की दीक्षा वैदिक गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र करते हैं तो कृष्ण की दीक्षा आङ्गिरस ऋषि देते हैं। आङ्गिरस अथर्वण परम्परा के वाहक रहे हैं और आगम का स्रोत अथर्ववेद ही है।  चन्द्र यानि शक्ति, सूर्य यानि शिव। राम में पौरुष के सारे गुण वहीं स्त्रियोचित मधुरता से परिपूर्ण कृष्ण। सूर्य का ताप गर्म तो चन्द्र का ताप शीतल। सूर्य और चन्द्र वंश के राजाओं की वंशावली देखें तो भी ये गुण परिलक्षित होगा। रामायण और महाभारत देखें तो भी यही परिलक्षित होगा। सूर्य वंश के राजा हरिश्चंद्र स्वप्न में दिये वचन को निभाते हैं तो चंद्रवंश के दुष्यन्त अपना दिया वचन भूल जाते हैं। चन्द्र वंश के हैहय वंशी तो अपना दिया दान भी भार्गवों से लेने चले जाते हैं। वहीं राजा रघु ऋषि को दान देने के लिये स्वर्ग पर चढ़ाई करने लगते हैं।

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