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ब्रह्म और महासून्यता शून्य से परे एक आध्यात्मिक दृष्टि

Nothingness*
हमारी संस्कृति में ‘शून्यता’ शब्द बहुत बार गलत समझा और व्याख्यायित किया गया है। गणितीय शून्य केवल संख्या है एक अंक जो मात्रा की अनुपस्थिति दर्शाता है। वहीं सन्यता/सून्यता (Sunnata) का अर्थ है सब कुछ का अभाव -न कोई गुण, न कोई वस्तु, न कोई पहचान। मेरी पुस्तक और शोध इसी फर्क को स्पष्ट करने का प्रयत्न है और बताती है कि ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप महासून्यता के साथ कैसे जुड़ा है।
ब्रह्म न तो केवल साकार है और न ही केवल निराकार। वह वह परम वास्तविकता है जो किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में आकर स्वयं को व्यक्त या परिभाषित नहीं करती। जब हम कहते हैं “अद्वैत” या “निरवंश”, तो हम उसी अनुभव की ओर संकेत करते हैं जहाँ अंतर, विभाजन और पहचान मिट जाती है। महासून्यता वह स्थिति है जहाँ सभी विरोधाभास और गुण-धर्म नष्ट हो जाते हैं; न तो अस्तित्व का गुण बचता है और न ही न अस्तित्व का। यह किसी भी विचार से परे, किसी भी शब्द से परे है।
यह विचार मात्र दार्शनिक तर्क नहीं इसका प्रभाव हमारे जीवन पर गहरा होता है। जब व्यक्ति महासून्यता का अनुभव करता है, तब अहंकार के बंधन घटते हैं; भय, लालसा और द्वन्द्वों का भार हल्का होता है। यह अनुभव केवल आत्म-उद्धार का मार्ग नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और मानसिक शांति का आधार भी बन सकता है। ऐसे समय में हमारी उद्धार कार्रवाइयाँ अधिक सहानुभूतिपूर्ण और व्यापक दृष्टि से प्रेरित होती हैं।
आधुनिक विज्ञान और ब्रह्म विचार के बीच भी रोचक समानताएँ मिलती हैं उदाहरण के लिए क्वांटम भौतिकी में निर्धारितता का अभाव और अवलोकन की भूमिका। परंतु यह समानता सतही है; महासून्यता का आध्यात्मिक अर्थ केवल वैज्ञानिक विधियों से सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसे प्रत्यक्ष अनुभूति और चिंतन दोनों की आवश्यकता है। मेरी पुस्तक ने इस परिप्रेक्ष्य को साहित्यिक और तर्कपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया है ताकि पारंपरिक शास्त्रीय ज्ञान और आधुनिक मनोवैज्ञानिक समझ के बीच सेतु बन सके।
हमारे समय में जब तेजी, उपभोक्तावाद और पहचान राजनीति हर तरफ है, महासून्यता का संदेश एक गंभीर पूछताछ देता है: क्या हमारी असली पहचान वही है जो हम सोचते हैं? या वह कुछ अधिक मौन और व्यापक है? यदि हम व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर इस प्रश्न को अपनाएँ, तो जीवन के प्राथमिक उद्देश्यों और मूल्य प्रणालियों में बदलाव आ सकता है अधिक समरसता, कम संघर्ष और गहन आत्म-ज्ञान।
निष्कर्षतः, महासून्यता का अर्थ सिर्फ ‘खालीपन’ नहीं; वह एक सक्रिय, परिवर्तनकारी अनुभूति है जो अस्तित्व के अन्तर्निहित आधार तक पहुँचाती है। ब्रह्म की उस मौन वास्तविकता का स्पर्श- जिससे सृष्टि और चेतना दोनों उभरती और लयबद्ध होती हैं-हमें एक नया दृष्टिकोण देती है: जीवित रहकर भी पृथक नहीं रहने का।

लेखक: निशांत गौतम

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