Latest Updates

सोच सको तो सोचो

गिलगित बाल्तिस्तान हमारा है हमको लौटाओ। वरना जबरन ले लेंगे मत रोओ मत चिल्लाओ।। खून सने कातिल कुत्तों से जनता नहीं डरेगी। दे दो वरना तेरी छाती पर ये पाँव धरेगी।। तेरी मेरी जनता कहने की ना कर नादानी। याद करो आका जिन्ना की बातें पुन: पुरानी।। देश बाँटकर जाते जाते उसने यही कहा था-…

Read More

सच्चा है एक प्यार तुम्हारा

सच्चा है एक प्यार तुम्हारा। बाकी तो सब यहाँ  झूठ हैं।। फैला हिय दीपक उजियारा। बाकी तो सब भृम रूप हैं।। इत उत ढूंढे कण कण में। पल्लवित तेरा ही स्वरूप है।। मूढ़ मन को समझ न आये। गूढ़ तेरा हर मन रूप हैं।। नैनो में दर्शन की चाह । तू नैनो में ही समाया…

Read More

शिवसेना की फजीहत !

राजनीति के द्वंद्व मे फँसी शिवसेना महाराष्ट्रा मे आजकल बिना पेंदी के लोटा हो गयी है । धृतराष्ट्र बने ऊधव ठाकरे , बेटे आदित्य को सी ऍम बनाने के लिए हर विचारधारा को मानने को तैयार बैठे है ।  यकीन नही होता की जिस बाला साहेब ठाकरे ने मातोश्री से राजनीति की शुरुआत की और…

Read More

प्रदूषण भी दौड़ा दिल्ली की ओर !

देखिए जनाब दिल्ली की दौड़ का नायाब नमूना , पंजाब और हरियाणा की पराली का धूंआ भी दिल्ली की तरफ दौड़ रहा । पूरी दिल्ली और नोयडा एयर क्वालिटी इंडेक्स के गुस्से से थर थर कॉप रही । अभी कल ही अपने राजनीति के महान दिग्गज अभिनेता श्रीमान् केजरीवाल जी मिले मैंने पूछा सर दिल्ली…

Read More

..पिता….. (कविता-11)

करता है जिसकी खातिर दिन-रात पिता मेहनत। ढोता सिर पर बोझा, देता है मिटा सेहत। आदर्श ,संस्कार ,व्यवहार सिखाता। सच्चाई की हमेशा ही राह दिखाता। तुम समय के साथ बदल जाओगे कभी, लेकिन कभी पिता की बदलती नहीं फितरत,,,,,,, जन्म से ही पाल पोश, जवान कर दिया। शिक्षा हुनर देकर गुणवान कर दिया। पूछा नहीं…

Read More

पिता (कविता-10)

इस संसार में आकर ,हमनें पिता को शीश नवाया हैं। हमारे रूप को देखकर ,पिता ने अपने रूप को हममें देखा हैं।। जब हम हँसते मुस्कराते हैं ,पिता ने हममें अपनी मुस्कान को पाया हैं। जब हम व्याकुल दुखी होते हैं, पिता ने भी हमारे सभी दुखो को समेटा हैं।। माता ने पिता को पाकर…

Read More

पिता (कविता-9)

जीवन के अनुभवों की खान पिता धूप पिता , छांव पिता मां है धरती तो आसमां पिता सर उठा कर गर्व से चल पाऊ जिस से पाया है वो ज्ञान पिता कैसे धन्यवाद करू पिता का मेरे जीवन का अभिमान पिता शत शत नमन मंगला का कर लो स्वीकार पिता मन में भाव छुपाएं लाखों…

Read More

पिता (कविता-8)

बाप के ही अंश होते राम,श्याम,कंस होते धर्म का ये भाव है की उन्हें न बिसारिए। दोनों हाथ जोड़कर गर्दनें को मोड़कर सामने से पैर छूके स्वयं को उबारिए। जहाँ कहीं आप   फँसें देख चार लोग  हँसे पुरखों की बात मान पिता को पुकारिए। नीति,रीति,ज्ञान लेके मान व सम्मान लेके लोकहितकारी बन पिताजी को तारिए।।…

Read More

पिता (कविता-7)

है आधारशिला उन सपनों की जिस पर यह परिवार टिका जग में सर्व प्रिय उद्भोधन है उसको हमने कहा पिता। संस्कार सहित हृदय से अपने सींच रहा परिवार का उपवन ख़ुद सहकर कष्ट सारा लगा रहा तन मन धन प्रातकाल निद्रा को त्यागें कर्मस्थली की ओर भागे कार्य स्थल में करके कार्य लोटे थका हारा…

Read More

बाबू जी की स्मृति में.. (कविता-6)

बाबू जी की याद बहुत ही आती हैं            स्मृतियों की विपुल राशि संग लाती है… बचपन की धुंधली तश्वीरें जुड़ करके जीवन की आपा-धापी से मुड़ करके नयनों से चुपचाप उतर कर अन्तस् में लगता जैसे पास मुझे वह बुलाती है….          बाबू जी की याद बहुत ही आती है          स्मृतियों की विपुल…

Read More