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ग़ज़ल : आशुतोष द्विवेदी

हारी, थकी, उदास निगाहें जाग रहीं,

ज़ख्म सो गए मगर कराहें जाग रहीं।

अब वे रातें सपनों जैसी लगती हैं,

हमें सुलाकर गोरी बाहें जाग रहीं।

चिंता करते-करते चिता हो गए हम,

राख में अब भी बिखरी चाहें जाग रहीं।

बेदम होकर झपकी लेते पाँवों में

कब से उलझी-उलझी राहें जाग रहीं।

कबके उजड़े उम्मीदों के बिस्तर पर,

अब भी हैं कुछ ठंडी आहें जाग रहीं।

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