तब बचपन में
घर के आँगन में बने मन्दिर में,
मन्दिर के सामने रखे तुलसी के बिरवे को
जल चढ़ाते हुए तुम्हारा ख्याल आता था
‘ मोहन ‘
तुम्हारा हँसना
मुरली बजाना
यमुना-तट पर गोपियों को रिझाना
रिसियाना, अकुलाना और बुलाना
कितना मधुमय लगता था
तुम्ही मेरे कृष्णा हो, राधेय हो
ज्ञेय-अज्ञेय हो,
तुम्हीं धनश्याम हो, गोपाल हो
यशोदा के लाल हो
नन्दलाल भी तुम्हीं हो
राग-रंग-रूपमय राशि गन्ध के…
तुम्हें स्वप्न में देख
मेरा चेहरा खिल उठता था, मगर-
नींद उचटते ही एक विरह भाव
बेचैन कर जाता था–कृष्णा!
आज भी टुकुर-टुकुर तुम्हें निहार रही हूँ
वृन्दावन-गोकुल की गलियों में
कदम्ब की डालियों पर चढ़ना
यमुना-जल में नागनथैया करना
गोपियों का माखन खाना-खिलाना
वृन्दावन कुंजों में छुपना-छुपाना
उस खेलकूद को भूलना-बिसराना
अब मुश्किल होगा, क्यूँकि
तुम्हीं तो मेरे इस पवित्र जीवन की डोर हो
कब तक पूजूँ ये तुलसी का बिरवा
तुम्हारा शुभंकर नाम लेकर
मेरे मन-मन्दिर में अहर्निश बसे मोहन
आ जाओ तुम!
डॉ.मनीषा गिरि
भजनपुरा, दिल्ली-110053
