माँ,
कभी एक पल को ठहरकर सोचना,
तेरा बेटा भी एक इंसान है…
हाँ, वो बेटा जिसे तूने बचपन में गिरने से पहले पकड़ लिया था,
पर अब जब वो टूट रहा है… तो कोई नहीं देखता।
आजकल ज़माना बदल गया है,
अब हर पुरुष या तो अपराधी है या अपराधी घोषित कर दिया गया है।
समाज में एक ऐसा तबका खड़ा हो गया है
जो खुद को “महापुरुष” कहता है —
लेकिन उनका पुरुषों से कोई लेना-देना नहीं,
सिर्फ स्त्रियों के ठेकेदार बन बैठे हैं।
इन्हीं के कारण अब
पुरुष होना अपराध बन गया है।
अब बेटा होना—दोष है,
पति होना—शोषक होना है,
पिता होना—पितृसत्ता का प्रतीक है,
भाई होना—संदेह के घेरे में है।
जब कोई पुरुष झूठे आरोपों में फंसता है,
तो उसकी आँखों की नमी नहीं दिखाई देती,
जब कोई निर्दोष पुरुष आत्महत्या कर लेता है,
तो अख़बार के कोने में एक लाइन छपती है —
“दोषी था शायद”।
क्यों माँ?
क्या इसलिए कि मैं लड़का हूँ, तो मुझे तकलीफ़ नहीं होती?
क्या मेरी आँखों के आँसू पानी से हल्के हैं?
क्या पुरुष का जीवन इतना सस्ता हो गया है
कि उसकी तकलीफ़ों का कोई मोल ही नहीं?
कितनी बार सोचा है किसी ने कि
किसी लड़के को हर वक्त “मर्द बनो”, “मत रो”,
“मजबूत बनो”, “भावना मत दिखाओ” कहकर
हमने उसमें कितनी आत्महत्या पनपा दी है?
इन महापुरुषों को मेरा प्रणाम नहीं — घृणा है,
क्योंकि उन्होंने समानता की आड़ में एक नया भेदभाव खड़ा कर दिया।
इन्होंने हमें नहीं बचाया, हमें बदनाम किया।
हर पुरुष को सिर्फ़ एक “आरोपी” बना दिया।
क्या किसी महिला के दोषी होने की कल्पना भी कर सकते हैं ये?
नहीं, क्योंकि इनके लिए स्त्री देवी है और पुरुष रावण।
माँ, ये लेख मैं तुझसे इसलिए कह रहा हूँ,
क्योंकि तू मेरी पहली शिक्षक है।
अगर तू समझेगी कि पुरुष भी इंसान है,
तो शायद अगली पीढ़ी बेटियों को
सिखाएगी कि “पुरुष भी रोते हैं, उन्हें भी दर्द होता है, वो भी इज्ज़त के हक़दार हैं।”
स्त्री की सुरक्षा ज़रूरी है — बिलकुल,
लेकिन पुरुष का भी सम्मान ज़रूरी है।
अगर एक ही तराज़ू में बराबरी चाहिए,
तो उसमें दोनों पलड़े भरने होंगे।
मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ… कि मुझे दोषी साबित होने से पहले गुनहगार मत समझो।
मैं पुरुष हूँ… पर सबसे पहले
इंसान हूँ।
