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‘चालीस रुपये’

            “सीमा आज स्कू्ल नहीं गयी ?”

     “नहीं चाची ,आज काम करते देर हो गयी।”

     सीमा ने कुछ सकुचाते हुए बंगालिन चाची को जवाब दिया ।

        बंगालिन चाची सारे बच्चों के लिए उनका यही नाम था। वे एक लम्बी सांँवली-सी महिला थीं लेकिन उनका चेहरा अनायास आकर्षित करता हुआ था। धर्म से वे बंगाली थीं और उनका स्वभाव तो बहुत ही अच्छा था। उनकी अपनी कोई भी सन्तान नहीं थी लेकिन वे मोहल्ले के सारे बच्चों को बहुत प्यार करती थीं। मोहल्ले के सारे बच्चे उनको घेरे रखते थे। वे सभी बच्चों को कुछ न कुछ खाने को देतीं,कभी पढ़ातीं और कभी किसी बच्चे की कोई समस्या होती तो उसे भी ध्यान से सुनतीं और समाधान भी करतीं ।

       सीमा भी ज्यादातर अपना काम करने के बाद उन्हीं के पास चली जाया करती थी। बाकी बच्चों के साथ सीमा भी उनसे कुछ न कुछ सीखती ही रहती थी।

         सीमा के पिताजी वहीं किराए पर रहा करते थे। सीमा अपनी बहन के साथ पिता के पास रहती थी। उसकी माँ ज्यादातर गांँव में ही रहा करती थीं अतः पढ़ाई के साथ-साथ घर के सारे काम भी उसे ही करने पड़ते थे। कभी-कभी तो घर का काम पूरा करते-करते वह विद्यालय जाने के लिए भी तैयार नहीं हो पाती थी। देर हो जाने के कारण विद्यालय में उसकी अनुपस्थिति सबसे ज्यादा होती थी। वैसे तो उसका मुख्य सपना पढ़ाई था और वह भी वह ठीक तरह से नहीं कर पा रही थी। हाँ बंगाली चाची उसका हौसला जरुर बढ़ाया करतीं, उसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया करती थीं।

       रात में भी सीमा को पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता था और कारण यह ह़ोता की एक ही कमरे का मकान उसके पिता ने ले रखा था और उनकी आदत रात आठ बजे तक सो जाने की थी और वह भी लाइट ऑफ करके। कभी-कभी तो उसे बाहर से बर्तन धोकर अंँधेरे में ही अन्दाज से कमरे के अन्दर रखना पड़ता था। वह चुपचाप बर्तन धोकर अन्दर रखती और सो जाती। विद्यालय का काम नहीं कर पाने की उलझन उसे सोने भी नहीं देती थी और वह देर देर तक जागती ही रहती जाती थी। कभी-कभी वह चुपके से रो लेती ।पढ़ाई ढ़ंग से नहीं कर पाने की पीड़ा उसे बहुत ही कष्ट पहुँचाती थी ।

      इन सबके बावजूद वह गणित व साइंस विषय में काफी अच्छी थी। उस समय आठवीं के बाद ही साइंस, आर्ट्स, कॉमर्स का चयन हो जाता था। उसे साइंस पढ़ने के लिए करीब पन्द्रह किमी दूर के विद्यालय में जाना था। उसके पिता जी उसको दूर भेजकर नहीं पढा़ना चाहते थे। वैसे तो वे उसको पढ़ाना ही नहीं चाहते थे। वे थोड़ा पिछड़े ख्यालों के व्यक्ति थे। उन्हें लगता था कि लड़कियों को अधिक नहीं पढ़ाना चाहिए । वे चाहते थे कि लड़की जैसे ही पन्द्रह-सोलह साल की हो जाए, उसकी शादी

कर देनी चाहिए। वह लड़की जाति है,ज्यादा पढ़कर

करेगी ही क्या। कुछ पुरानी विचारधारा उनके ऊपर

हावी थी और कुछ हद तक पुरुषवादी सोच कि

बेटी उनसे आगे नहीं निकल जाये। ऐसी सोच वाले लोग भी समाज में हैं ही। लोगों ने बहुत समझाया कि बेटी को साइंस दिला दो ये उसमें अच्छा कार्य कर सकती है परन्तु उसके पिताजी कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे। आखिरकार हारकर सीमा को आर्ट्स विषय लेकर हाईस्कूल की पढ़ाई आरंभ करनी पड़ी। वह करती भी तो क्या करती। उसे तो यही लगता था कि उसके पिताजी उसे पढ़ा दे रहे हैं यही उसके लिए बहुत बड़ी बात है ।

       समय बीतता गया और दसवीं परीक्षा के बोर्ड का फॉर्म भरने का समय आ गया। उस समय दसवीं के बोर्ड के फॉर्म भरने के लिए विद्यालय में चालीस रुपये फीस जमा कराने पड़ते थे। सीमा ने अपने

पिताजी से बड़ी मिन्नत करते हुए चालीस रुपये

मांँगे पर उन्होंने सीधे इन्कार कर दिया, “नहीं अब

कोई भी बोर्ड-वोर्ड का फार्म नहीं भरा जायेगा, मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

        सीमा आवाक् सी खड़ी थी। उसे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे? कुछ लोग उसके पिताजी को समझाने भी आये

तो उन्होंने  साफ-साफ कह दिया, “नहीं मैं इसको अब नहीं पढ़ा पाऊँगा, हमारे यहाँ लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता है।” लोग वापस लौट

गये, वे और करते भी तो क्या करते।

      सीमा का रो-रोकर बुरा हाल था। कभी वह भगवान को दोष देती कि वे उसके बाबा-दादी को

क्यों ले गये । यदि वे होते तो उसकी पढ़ाई बहुत ही अच्छे ढंग से हो रही होती। वह कभी बंगालिनचाची के पास जाती कि शायद वह उनकी बात सुन लें।अब उसके मन में विद्रोह की भावना जन्म लेने लगी थी। उसे पढ़ना था बस पढ़ना। तीन दिन तक उसने कुछ भी नहीं खाया बस चुपचाप घर का सारा काम करती और कभी अकेले में कभी बंगालिन चाची के पास जाकर रोने लगती।

      आखिर तीसरे दिन बंगालिन चाची का दिल पिघल ही गया। उन्होंने उसका साथ देने का निश्चय कर लिया। “तुम फार्म भरो,मैं तुम्हें चालीस रुपये दे रही हूँ ।”सीमा को ऐसा लगा मानों डूबते हुए को मांझी का सहारा मिल गया। उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। वह तैयार होकर विद्यालय जाने लगी तो उसके पिता ने उसे धमकी दी -“अब वही तुझे पढ़ायेगी, मैं कोई भी खर्च नहीं दूँगा।”

        पर सीमा सबको अनसुना कर रही थी ।उसे केवल अपने बोर्ड परीक्षा के फार्म भरने का ही ध्यान था और फॉर्म भरने के लिए उसके हाथ में फीस के लिए चालीस रुपये थे।

 डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’

  दिल्ली।

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