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कुंडलियां – अजय कुमार पाण्डेय

बूंद नीर की थी गिरी, भर आए दो नैन

मन है कैसा बावला, क्यों होता बेचैन

क्यों होता बेचैन, हृदय में पीड़ा होती

अधरों पर मुस्कान, नैनों में अश्रु मोती

हिय पर्वत को लांघ, लहर थी उठी पीर की

दो पलकों के बीच, टिकी थी बूंद नीर की।

बिन मौसम बारिश हुई, बादल गरजे खूब

राह नहीं कुछ सूझती, सड़क गई है डूब

सड़क गई है डूब, पिया मैं आऊं कैसे

रोक रही है राह, कौंधती बिजली ऐसे

ऋतु होती रमणीक, गिरें जब बूंदें छम छम

सड़क बनी है ताल, बिना बारिश बिन मौसम।

लाए नभ पर मेघ फिर, बारिश का संदेश

तपती धरा झूम उठी, मिटा हृदय का क्लेश

मिटा हृदय का क्लेश, झूमता है अम्बर भी

दे रही जीवन नव, बूंदें प्रथम पावस की

झोंके पवन के मंद, मौसम सुखद हो जाए

जब गर्मी के बाद, बारिश राहत लाए।

अजय कुमार पाण्डेय

सी 402, वालफोर्ट सफायर

रायपुर (छ. ग.)

492010

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