(ग़ज़ल)
सावन का ऐसा!भोर होते देखा।
घनों काआपसीशोर होते देखा।
ब्रह्माण्ड की थी ऐसी जगमगाहट।
धरा को सुंदरऔर गोर होते देखा।
सावन का ऐसा।।।।।
पवन के झोंके हिलाए वटों को।
बारिश का पानी जोर होते देखा।
सावन का ऐसा।।।।।
फूली चमेली है घर पर जो मेरे।
उसकोभी मौजे विभोर होते देखा।
सावन का।।।।।।।।
चिखुरी के खेतों में पानी नहीं था।
खेतों में पानी लबोर होते देखा।
सावन का ऐसा।।।।।
थमने लगी बारिशों की अकुलाहट।
सूरज का ऐसा !अजोर होते देखा।।
सावन का ऐसा।।।।।।।।
भीम प्रसाद प्रजापति
