माँ (कविता-2)
मार्टिन उमेद नज्मी मैंने जमीं पे चलती फिरती ख़ुदा की अंजा देखी है , मैंने जन्नत नहीं देखी कभी मैंने अपनी माँ देखी है ॥ ———————- बेटी की शादी में गरीबी सह विधवा माँ खर्चे को हिचकिचाती रही , वो ज़बां पर ख़ामोशी के ताले डाल इक इक रस्म-ओ -रिवाज निभाती रही ! ———————- माँ…
