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गुरु दक्ष प्रजापति: सृष्टि के अनुशासन और संस्कारों के प्रतीक

(13 जुलाई जयंती विशेष)  *गुरु दक्ष प्रजापति: सृष्टि के अनुशासन और संस्कारों के प्रतीक* सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पुत्र गुरु दक्ष प्रजापति वेदों, यज्ञों और परिवार प्रणाली के आधार स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने अनुशासन और मर्यादा को समाज में स्थापित किया, किन्तु शिव-सती प्रसंग के माध्यम से यह भी दिखाया कि कठोरता से प्रेम मर…

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का हथियारीकरण

21वीं सदी की महान उपलब्धियों में से एक है स्थानों को बहुत सटीक रूप से निर्धारित करने की क्षमता। एक स्मार्टफोन आसानी से खुले स्थान कोड (“प्लस कोड”) का उपयोग करके 3.5 मीटर या उससे कम की दूरी वाले वर्ग के अंदर खुद को जियो लोकेट कर सकता है। प्लस कोड मिनट और सेकंड के…

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दुर्घटना पीड़ितों के लिए “कैशलेस” उपचार : नीयत नेक, व्यवस्था बेकार

इस देश में जब कोई सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त होता है, तो सबसे पहले यह नहीं पूछा जाता कि ज़ख्म कितना गहरा है — पहले यह पूछा जाता है कि “पहचान पत्र है?”, “बीमा है?”, “अस्पताल पंजीकृत है?” और फिर अंत में — “बचा पाएँगे या नहीं?”। मानो पीड़ित की जान से पहले कागज़ ज़रूरी हो।…

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पूजहि विप्र सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।।

पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक़ एवं पत्रकार जौनपुर, यूपी  रामचरित मानस में बाबा तुलसीदास कहते है कि पूजहि विप्र सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।। औऱ वही मनु स्मृति कहती है कि-  अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। षोडशैव तु  वैश्यस्य  द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च॥ ब्राह्मणस्य  चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत्। द्विगुणा …

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काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती

काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती फिर अन्य रंगों का क्या होता इंद्रधनुष में सात रंगी न होता आसमां नीला न होता और फूल,फल सब बहुरंगी न होते पत्तों का रंग हरा न होता न ही धरती अंतरिक्ष से काली दिखती न ही अंधेरे का कोई सम्राज्य होता। काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती गोरी…

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पेंशन का अधूरा वादा: भारत के बुज़ुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की लड़ाई

भारत आज जनसंख्यिकीय संक्रमण के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ युवाओं की अधिकता के पीछे छिपी एक चुप्पी है — बुज़ुर्गों की बढ़ती आबादी, जिनके पास न आय का स्रोत है, न सामाजिक सुरक्षा का भरोसा। जिस देश में “बुजुर्गों को आशीर्वाद का भंडार” माना जाता है, वहाँ उनकी वृद्धावस्था की सबसे बड़ी सच्चाई…

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कुंडलियां – अजय कुमार पाण्डेय

बूंद नीर की थी गिरी, भर आए दो नैन मन है कैसा बावला, क्यों होता बेचैन क्यों होता बेचैन, हृदय में पीड़ा होती अधरों पर मुस्कान, नैनों में अश्रु मोती हिय पर्वत को लांघ, लहर थी उठी पीर की दो पलकों के बीच, टिकी थी बूंद नीर की। बिन मौसम बारिश हुई, बादल गरजे खूब…

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