राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
सांसदों और विधायकों का ससंद या विधानसभा के अंदर किया जाने वाला व्यवहार अब आम व्यक्तियों को भी अखरने लगा है । वित कुछ वर्षों से यह परिपाटी सी बनती जा रही है कि जब भी संसद का या विधानसभा का सत्र प्रारंभ होगा तब ही विपक्ष हंगामा करेगा । यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात तो नहीं मानी जा सकती । एक सत्र में प्रतिदिन कितना पैसा खर्च होता है वह अलग बात है पर ऐसे हंगामें से आमजन का कितना नुकसान होता है वह अधिक महत्वपूर्ण होता है । प्रश्न वही कि हंगामा क्यों ? आपको अपनी बात रखने के लिए एक मंच मिलता हे और यह मंच न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी देखा और सुना जाता है । सदन में अपनी बात रखने के अपने मायने हैं और सदन के बाहर अपनी बात रखने का कोई ज्यादा अर्थ नहीं होता । सदन में बोली गई हर एक बात रिकार्ड में भी दर्ज होती है और आमजनता तक भी पहुंचती है पर विपक्ष सदन में केवल हंगामा करता है । विपक्ष कोई भी हो, जहां भाजपा विपक्ष में है वहां वह भी ऐसा ही करती है और कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल भी ऐसा ही करते हैं, आरोप केवल एक ही कि उनको सदन में बोलने नहीं दिया जाता है । विपक्ष के इस आरोप पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है । जाहिर है कि सदन में वपिक्ष की संख्या कम ही होती है ऐसे में कई बार ऐसा देखा भी गया है कि जब विपक्ष का कोइ्र नेता बोलता है तो सत्ता पक्ष के नेता शोरशराबा करते हैं । उनके शोर करने से विपक्ष को लगता है कि उनकी बात शोरगुल में गुंम हो गई है । बहरहाल सदन में चुने हुए प्रतिनिधि पहुंचते हैं जिनको उनके क्षत्र की जनता बहुत उम्मीदों के साथ सदन में अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजती है । एक चुने हुए जनप्रतिनिधि के पास न केवल अपने क्षेत्र की जनता की उम्मीदों को टोकरी होती है बल्कि वे जिस राजनीतिक दल से चुनकर आए हैं उस राजनीतिक दल की उम्मीदें भी होती हैं । लोकसभा का वर्तमान सत्र भी हंगामें की भेंट चढत्र चुका है । सदन प्रारंभ हांता है और स्थिगित हो जाता है, फिर सांसद सदन के बाहर आकर हंगामा करते हैं जिसे मीडिया के माध्यम से पूरा देश देखता है । सदन में चर्चा हो ऐसी व्यवस्था के प्रयास तो किए जाते हैं पर प्रयास सफल नहीं हो पाते । ऐसा ही नजारा विगत बजट सत्र में भी देखने को मिला था और इसके पूर्व भी । विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं होती और वे एक मुद्दा लेकर हंगामा करते रहते हैं और अंत में सदन अपनी घोषित कार्यविधि पूरी कर खत्म हो जाता है । इस बार विपक्ष के पास ऑपरेशन सिंदूर का मुद्दा तो है ही साथ में बिहार में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे वोटर लिस्ट संशोधन का मुद्दा भी है । वैसे तो वपिक्ष मुद्दों को जोड़ ही लेता है कई बार तो वो अडानी के मुद्दे पर भी हंगामा कर चुका है । वोटर लिस्ट के मुद्दे पर बिहार विधानसभा में भी ऐसा ही हंगामा होता देखा गया । बिहार की विपक्षी पार्टी जेडीयू ने पूरे सत्र में हंगामा किया, कानले कपड़े पहनकर अपना विरोध दर्ज कराया और सत्ता पक्ष के साथ तालमेल नहीं बैठा पाया । बिहार में अब बस कुछ ही महिनों के बाद चुनाव होने हैं ऐसे में बिहार विधानसभा का यह सत्र महत्वपूर्ण था पर सदन चल नहीं पाया । लोकसभा में भी ऐसी स्थिति रहीं । सत्तापक्ष को विपक्ष के प्रश्नों के उत्तर देने चाहिए पर वे तब ही उत्तर दे सकते हैं जब वे सुनने को तैयार हों । कोई भी उत्तर विपक्ष की सोच के अनुसार तो हो नहीं सकता और विपक्ष अपनी सोच के विपरीत उत्तर सुनने को तैयार नहीं होता । लोकसभा और राज्यसभा से लेकर विभिन्न विधानसभाओं तक की यह ही स्थिति हो गई है । राज्यसभा में उपराष्टपति जो राज्यसभा के अध्यक्ष होते हैं जगदीप धनकड़ जी ने त्यागप़त्र दिया वो भी सदन के प्रथम दिवस को पूर्ण करने के बाद ही कारण अपना स्वास्थ्य बताया । सभी जानते हैं कि स्वास्थ्य का कारण केवल भ्रमित करने वाला हो सकता है इसके पीछे कुछ घटनाक्रम अवश्य है जो अभी सामने नहीं आया है । वैसे जगदीप धनकड़ साहब सत्तापक्ष के साथ तालमेल बिठाए रहे हैं इसके चलते ही कई बार उन्हें विपक्ष के विरोध का सामना भी करना पड़ा है । सत्तापक्ष के साथ नजदीकियों के बावजूद उनका त्यागप़ देना किसी विशेष परिस्थितियों की ओर ही इंगित करता है । सभी लोगों ने अपने-अपने ढंग से कयास लगाए हुए हैं पर इन कयासों के इतने मायने नहीं हैं जब तक वे स्वयं ही सामने आकर अपनी बात नहीं रखते । वेसे जो लागे जगदीप धनकड़ जी को जानते हें उनका मानना है कि जगदीप धनकड़ जी कभी आगे आकर उन परिस्थितियों को नहीं बताएंगें जिसके कारण उनको सदन के प्रारंभ होने के प्रथम दिवस ही त्यागपत्र देना पड़ा है । यदि वाकई उनको त्यागपत्र देना था तो वे सदन प्रारंभ होने के पूर्व ही त्यागपत्र दे सकते थे जिस दिन उन्होने त्यागपत्र दिया उस दिन वे पूर्ण रूप से स्वस्थ्य रहते हुए दिनभर सदन का संचालन बेहतर ढंग से करते रहे फिर यकायक क्या हुआ कि उन्होने रात्रि में त्यागपत्र दे दिया ? प्रश्न तो हैं पर उत्तर नहीं हैं और जब तक उत्तर नहीं हैं तब तक यह ही मान लिया जा सकता है कि उन्होने अपनी अस्वस्थता के कारण ही त्याग पत्र दिया है । अब नए उपराष्टपति के चुनाव की तैयारियां भी होने लगी हैं । नया उपराष्टपति सत्तापक्ष से ही होगा यह बताया जा चुका है । बहुत पहले ऐसी परंपरा थी कि राष्टपति सत्तापक्ष से होते थे और उपराष्टपति विपक्ष से पर बाद में यह परंपरा खत्म हो गई । अब सत्तारूढ़ दल चाहता है कि उसके पस बहुमत है तो दोनों महत्वपूर्ण्ा पद उनके पास ही रहें । उपराष्टपति का पद इसलिए भी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वो राज्यसभा के अध्यक्ष भी होते हैं । राज्यसभा महत्वपूर्ण सदन होता है । उपराष्टपति के चुनाव मे कुछ समय लगेगा तब तक वर्तमान उपसभापति ही राज्यसभा का संचालन करेगें । इस बार के सदन का प्रारंभ ऐसे ही हुआ है और हंगामा निरंतर होता चला गया । पर इस परिपाटी को रोकना होगा वरना सदन केवल औपचारिकता में ही बदल जाएगा । बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं और वहां चुनाव आयोग वोटरलिस्ट के संशोधन का कार्य युद्ध स्तर पर कर रही है । अमूमन ऐसा होता नहीं है कि चुनाव की समयावधि नजदीक हो तो संम्पूर्ण वोटरों को वैरीफिकेशन इस ढंग से हो । ज्ञानेन्द्र सिंह जी कुछ महिनों पूर्व ही मुख्य चुनाव आयुक्त बने हैं यह उनकी कार्यशैली को भी दिखाता है । पर उनकी यह कार्यशैली हंगामें का कारण बनी हुई है । हर एक वोटर को अपनी पहचान के प्रमाण देना है और जो प्रमाण देना है उसमें न तो वोटर आईडी शामिल है और न ही आधारकार्ड शामिल है । अमूमन आधारकार्ड को ही अब पहचान के रूप में मुख्य दस्तावेज समझ लिया गया है पर चुनाव आयोग इसे पहचान का आधार तो मान रही हे पर प्रमाण नहीं । बिहार में अधिकांश मतदाताओं को इसके चलते ही परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और विपक्ष भी इसे लेकर हंगामा कर रहा है विपक्ष को भय है कि उसको समर्थन देने वाले ज्यादातर मतदाता वोटर लिस्ट से अलग हो जायेगें और चुनाव आयोग का कहना है कि जो अपने होने का प्रमाण ही न दे पाए उसे वोट डालने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है । यह पहली विघानसभा है जहां यह प्रयोग किया गया है और यह सफल होता है तो एक-एक कर पूरे देश की विधानसभाओं में यह प्रयोग दोहराया जाएगा । विपक्ष का भयभीत होना इसके कारण भी है । वैसे सुप्रीमकोर्ट ने भी चुनाव आयोग के कार्य में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है तो अब विपक्ष के पास केवल हंगामा करना ही शेष रह गया है । पर लगता नही है कि इस हंगामें से कोई फर्क पड़ने वाला है । चुनाव आयोग तो अपना काम लगभग पूरा कर ही चुका है और इसके बाद यह तय माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में वोटर कम होने जा रहे हैं इनमें वे भी शामिल हैं जो मर चुके हैं और वे भी जो अपना प्रमाण नहीं दे पाए हैं ऐसे लोग ज्यादातर बंगलादेश अथवा नेपाल के घुसपैठिए हैं ऐसा कहा जा रहा है । बिहार विधानसभा के चुनाव की तैयारी प्रारंभ हो चुकी है और ऐसा माना जा रहा है कि इस वर्ष के अंतिम महिनों में चुनाव हो सकते हें । वैसे तो राजनीतिक दल भी अपनी तैयारी प्रारंभ कर चुके हें और राज्य में उनके दौरे भी चल रहे हैं । वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का यह तीसरा चुनाव होगा और फिलहाल तक तो भाजपा याने एनडीए गठबंधन यह कह रहा है कि चुनाव नीतिश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा । पर राजनीति में कुछ बाते स्थाई नहीं होती समय के हिसाब से उनमें अंतर आता है तो चुनाव की घोषणा के बाद क्या अंतर आने वाला है यह तो नहीं कहा जा सकता पर यदि नहीं आया तो नीतिशकुमार के चेहरे पर ही चुनाव होगा वहीं विपक्ष का चेहरा अघोषित रूप से तेजस्वी यादव ही होगें । कांग्रेस कुछ सीटों पर चुनाव लड़ेगी हांलाकि इस बार कांग्रेस के कन्हैया कुमार बहुत मेहनत कर रहे हैं वहीं सांसद पप्पू यादव भी कांग्रेस के लिए ही काम कर रहैं । महागठबंधन भी अपनी तैयारियों में लगा है पर अंत में सीटों पर जाकर पेंच उलझेगा । बिहार का चुनाव भी महागठबंधन के लिए महत्वपूर्ण है, पिछले चुनावमें यह गठबंधन सत्ता तक पहुंचते-पहुंचते रह गया था मात्र कुछ सीटें ही कम थीं पर इस बार महागठबंधन सत्ता पाने के लिए पूरा जोर लगा रहा है । बिहार में औबेसी की पार्टी का भी दखल है पिछले चुनाव में उन्हें भी कुछ सीटें मिल गई थीं और कुछ सीटों पर उनके कारण ही विपक्ष को पराजय का सामना करना पड़ा था । बहरहाल अब कुछ महिने बिहार ही सुर्खियों में रहेगा इसके बाद चुनावी रथ पश्चिम बंगाल पहुंच जाएगा क्योंकि वहां भी चुनाव होना है ।
