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व्यंग्य : शठम् शाठयं समाचरेत्….

पंकज सीबी मिश्रा /राजनीतिक विश्लषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

जी हां  ! प्रस्तुत व्यंग्य शुद्ध मवेशी संस्कृति को इंगित करता एक आंखे खोलने वाला आलेख है जिसे पढ़कर कुछ ठौर और धिंढोर के आंखो में सूजन आ सकती है ।  कल किसी दिशा से आवाज़ आई- ‘ वोट चोर, गद्दी छोड़। वोट चोर ने इस कान से सुना, उस कान से निकाल दिया क्युकी वोट चोर उसी की पार्टी का पुराना बूथ लुटेरा था जो मतपत्र की पेटिया लूट लिया करता था । फिर दो दिशाओं से आवाज आई तो भी उसने यही किया । जब तीन दिशाओं से आवाज आने लगी तो उसने दोनों कानों में रुई ठूंस ली और खुद जोर – जोर से वही चिल्लाने लगा । मगर जब चारों दिशाओं से यही आवाज आने लगी तो वह कुछ- कुछ घबराया, कुछ- कुछ चौंका ! कहीं पब्लिक सब समझ तो नहीं गई  ! मैं तो खुद ही पुराना चोर हूं ? फिर भी उसने कहा कि अच्छा जी, मेरे रहते ऐसा हो गया है। वोटों की चोरी हो गई है ! मुझे तो पता  ही नहीं चला। बेटा नवरतन चल तोतली आवाज में सुना भोट चोर अब्सिडी छोड़  ! नवरतन भौचक्का !  नेता जी को आज क्या हुआ खुद को ही तोर कहलवा रहे । मुझे पहले पता चल जाता तो मैं तुरंत रोक देता । मैं घनघोर लोकतांत्रिक मानवी हूं। मुझे पद का शौक नहीं। हार जाता तो पियरका चाच्चा को उठाकर चल देता ।  अब मैं असली चोर का पता लगाऊंगा और उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलवाऊंगा। इसके बावजूद आपको शक है कि भैया ही भोट चोर है तो बता दू भैया जी के पापा जी भोट नहीं मतपेटिका चोर थे , भैया जी तो टोटी चोर है । तो इस तथाकथित चोरी के पाप के प्रक्षालन के लिए मैं आज ही अपने सिर पर उस्तरा चलवाने  को तैयार हूं मगर तब आपको भईया जी को टोटी चोर कहना बंद करना होगा ! केश त्याग का हिन्डू धर्म में बहुत महत्व है ! मगर ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ की आवाज़ थमेगी नहीं। लोगों ने कहा, हमें तुम्हारे सिर के बालों से कोई मतलब नहीं। वैसे भी तुम गंजे हो। त्यागने के लिए तुम्हारे पास कुल चार ही तो लंबी नाक  हैं। फिर भी बाल तो तुम जितने चाहे, उगा लो। पूरी खोपड़ी बालों से भर लो मगर हो तो तुम मतपेटिका चोर के बेटे  थे हो और रहोगे। तभी बिहार से कोई बोला ‘वोट चोर गद्दी छोड़’। तेजपत्ता दास ने स्लोगन लपक लिया और कहा -‘ गद्दी और मैं और गद्दी छोड़ दूं ? यह हो नहीं सकता ! पापा की गद्दी कोई छोड़ता है भला ? गद्दी छोड़ने के लिए होती है!मैं जीवन छोड़ सकता हूं, गद्दी नहीं।चलो फिर भी तुम्हारा मन रखने के लिए मैं अपनी बरसों से प्यार से पाली हुई दाढ़ी छोड़ सकता हूं, जिसमें एक भी तिनका नहीं है। फिर तो मैं चोर लगूंगा भी नहीं। बिहार के लोगों ने कहा, हमें तेरी दाढ़ी से कोई मतलब नहीं। तू चाहे तो गुरुदेव जैसी दाढ़ी रख ले। चंद्रशेखर रावन जैसी मूंछें उगा ले। चोर तो फिर भी चोर ही रहेगा। ‘वोट चोर गद्दी छोड़’। तभी मुंबई में ख़ाकरे परिवार का बन्दा बोला !  अच्छा ऐसा है कि आजकल के चोर डकैत ऐनक पहनने लगे हैं। मैं भी ऐनक पहनता हूं । चलो, मैं इस महंगी ऐनक का त्याग करने के लिए तैयार हूं। गद्दी बचाने के लिए कोई भी त्याग छोटा नहीं। वैसे भी मुझे पढ़ने- लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं ! पढ़ने- लिखने वालों को मैं अपना दुश्मन मानता हूं। फिर आवाज आई, तू ऐनक तो बच्चों की तरह एक के ऊपर चाहे चार और पहन ले या दस- बीस पहन ले। देशी पहन ले या विदेशी पहन ले। एक लाख की पहन ले या दस लाख की पहन ले या मत पहन मगर ‘ वोट चोर, गद्दी छोड़’। तभी बंगाल से कोई दीदी टाईप की उड़ेल बोल पड़ी अच्छा चलो, ‘मैं चप्पल पहनना छोड़ दूंगी । बुर्का पहनने लगूंगी ।अब तो खुश। अब तो नहीं कहोगे, वोट चोर….’ जनता ने कहा, तू जूते पहन या चप्पल पहन या चाहे नंगे पांव रह।’वोट चोर, गद्दी छोड़।’ तभी कर्नाटक से किसी ने कहा, अच्छा चलो, बंडी पहनना छोड़ सकता हूं। उससे भी जब बात नहीं बनी तो उसने कुर्ता उतारने का प्रस्ताव दिया। फिर उसने कहा कि बनियान भी उतार दूंगा।उसने कहा, मैं कुर्सी के लिए तो पजामा भी  उतार सकता हूं बस अपने गान्दी सर कह दे  ! मगर इसके अंदर अंडरवियर नहीं है। फिर भी चलो, कुछ करके दिखाता हूं। तब भी चारों ओर से एक ही आवाज आ रही थी-‘वोट चोर गद्दी छोड़’। चोर वोटर अधिकार यात्रा की वैन के अंदर गया। पजामा छोड़कर चड्डी पहनकर आया। आवाज़ आई।अरे बेशर्म चोर, कपड़े पहन, बिहार छोड़। बेशर्म चड्डी में गद्दी पर बैठना चाह रहा‌। नीचे से आवाज़ आई – चमचों का राजा नंगा है। राजा ने  कहा, नहीं, राजा हरी चड्डी में है। नीचे से फिर कुछ लोगो की  आवाज़ आई -‘ वोट चोर, गद्दी छोड़। अगली बार जब आवाज़ आई – ‘वोट चोर’ तो चोर ने भी नारे में जवाब दिया – ‘गद्दी छोड़ ‘। अगली बार खुद चोर ने नारा लगाया – ‘वोट चोर’ नीचे से आवाज़ आई -‘ गद्दी छोड़।’ कभी भाड़े की जनता कहती ‘वोट चोर’, तो चोर कहता,’ गद्दी छोड़’। कभी चोर कहता, ‘वोट चोर ‘ तो जनता कहती- ‘गद्दी छोड़’। और इस तरह चोर यह खेल जनता से खेलता रहा और जब वह समझ गया कि उसके इस खेल को भी जनता समझ गई है इतना सुनते ही मै वहां से अंतर्ध्यान हो गया।

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