“असफलता” जैसी कोई चीज़ नहीं होती। सदियों से बुद्धिमान लोग यही कहते आए हैं। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने स्पष्ट रूप से कहा था, “…असफलता का अर्थ है “सीखने का पहला प्रयास”। कलाम जी की इस परिभाषा को मुझसे बेहतर शायद कोई और व्यक्ति नहीं अपना सकता।
21वीं सदी की शुरुआत में अपने गृह जिले पानीपत के एक साधारण से कॉलेज से बीए और एमए करने के बात यूजीसी की छात्रवृत्ति से पी-एचडी और उसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से दो-दो सरकारी नौकरियां पहली भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रम में और वर्तमान में राज्य सरकार में जिला स्तर पर एक विभाग के अध्यक्ष के रूप में सेवाएं दे रहा हूँ। इससे यह सिद्ध होता है कि उपलब्धि, अंकों और ग्रेड से जुड़ी नहीं होती। यह किसी को आत्मप्रशंसा लग सकती है, जबकि यह सब बताने का उद्देश्य भिन्न है।
अप्रत्याशित या प्रतिकूल परिणामों की निराशा का सामना करने वाले किसी युवा के लिए, असफलता अंतिम और जीवन से भी बड़ी लग सकती है। यह निराशा अक्सर अवास्तविक अपेक्षाओं और छात्र की क्षमताओं और योग्यताओं तथा जिस क्षेत्र में उन्हें प्रवेश करवाया जाता है, उसके बीच बेमेल-तालमेल के कारण उत्पन्न होती है। इससे निपटने के लिए छात्रों और हम, उनके पालन-पोषण करने वाले अभिभावकों, दोनों के दृष्टिकोण में भारी बदलाव की जरूरत होती है।
हम “असफलता” को किस रूप में देखते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह गतिविधि हमारे लिए क्या मायने रखती है। अगर हम किसी ऐसी चीज़ में लगे हैं, जिससे हमें आनंद आता है और कोई बाधा आती है, तो हम उसे सुधार के अवसर के रूप में देखते हैं। मुझे संगीत से प्यार है, मुझे साहित्य से प्यार है। अच्छा संगीत सुनना और अच्छी कविता सुनना, अच्छी कहानी पढ़ना बेहद आत्मसंतुष्टि देता है। यह निराशा और नकारात्मकता को ख़त्म करता है। माता-पिता होने के नाते, हमारे लिए यह समझना ज़रूरी है। अगर हमारे बच्चे अपनी गतिविधियों में रुचि रखते हैं और उनके प्रति उत्साहित हैं, तो वे विपरीत परिस्थितियों का बेहतर सामना कर सकते हैं। माता-पिता अक्सर, अपने बच्चों के लिए एक दृष्टिकोण रखते हैं—निःसंदेह, उनका इरादा अच्छा होता है। लेकिन हो सकता है कि ये दृष्टिकोण बच्चों की रुचियों के अनुरूप न हों। उन्हें लगता है कि बच्चों को महंगे कोचिंग सेंटरों में दाखिला दिलाने से उन्हें भविष्य में मदद मिलेगी। माना कि प्रमुख संस्थानों में प्रवेश पाने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं वाले बच्चों के लिए, ये कोचिंग सेंटर बहुत उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन सवाल यह है:- क्या माता-पिता अपने बच्चों को इन संस्थानों में उनके भविष्य के लिए अपनी दृष्टि के कारण भेज रहे हैं या उस क्षेत्र में बच्चों की अंतर्निहित योग्यता के कारण? यह भी बेहद विचारणीय और महत्वपूर्ण विषय है।
मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि माता-पिता को अपने बच्चों का मार्गदर्शन नहीं करना चाहिए। हमारी संस्कृति माता-पिता-गुरुदेव के पदानुक्रम पर आधारित है। माता, पिता, गुरु और ईश्वर। बच्चों को बड़े होने की जटिलताओं से निपटने में माता-पिता का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सबसे मूल्यवान सबक जो हम अपने बच्चों को सिखा सकते हैं, वह यह है कि अगर जुनून, लगन और सफलता पाने की इच्छाशक्ति हो, तो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता संभव है। बच्चों को हम जो भी अन्य मार्गदर्शन प्रदान करें, उसमें उनकी महत्वाकांक्षाओं, योग्यताओं और क्षमताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। माता-पिता होने के नाते, हमें यह समझना होगा कि जीवन केवल इंजीनियरिंग और चिकित्सा तक ही सीमित नहीं है। आधुनिक दुनिया हमारे बच्चों और युवाओं के लिए विभिन्न क्षेत्रों में प्रचुर अवसर प्रदान करती है। मेरा बेटा दसवीं कक्षा की परीक्षा देगा और हम भी इस बारे में अन्य अभिभावकों की भांति कुछ-कुछ चिंता करते हैं और शायद यह स्वाभाविक-सी बात है।
माना कि, आईआईटी वास्तव में असाधारण शैक्षणिक संस्थान हैं, लेकिन वे अकेले ऐसे संस्थान नहीं हैं जो भारतीय युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हैं। लगभग दो साल पहले मुझे सपत्नीक एक संगोष्ठी के सिलसिले में आईआईटी जोधपुर जाने का मौका मिला था। मेरी पत्नी विज्ञान की और मैं आर्ट का विद्यार्थी हूँ और वहां पर हमें भी एक पुरस्कार पाने का मौका मिला। और पुरस्कार पाने वालों की सूची में बुद्धिमान और मेहनती युवा, सभी आईआईटीयन नहीं थे। कईं हम जैसे साधारण पृष्ठभूमि के लोग भी थे।
यह एक और पहलू है जिस पर आत्म-निरीक्षण ज़रूरी है। बच्चों की तुलना करने से कोई फायदा नहीं हो सकता। हर बच्चा अनोखा होता है और ऐसी तुलनाओं के हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं, खासकर उस उम्र में जब बच्चे माता-पिता की स्वीकृति और प्रोत्साहन चाहते हैं। माता-पिता और बच्चों, दोनों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि किसी भी परीक्षा में अंक और रैंक सिर्फ़ संख्यात्मक प्रतिनिधित्व हैं और छात्र की समग्र बुद्धिमत्ता को नहीं दर्शाते। हालाँकि सफलता के लिए कड़ी मेहनत जरूरी है, लेकिन सिर्फ़ अंकों पर अड़े रहने से अनावश्यक तनाव हो सकता है। ऐसे कई मामले हैं जहाँ छात्र अत्यधिक दबाव के कारण अप्रत्याशित रूप से और अचानक खुशी से उदासी में चले जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कभी-कभी दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद परिणाम सामने आते हैं।
बच्चों पर कंप्यूटर विज्ञान जैसे कुछ क्षेत्रों में पढ़ाई करने का भी बहुत दबाव होता है। कोई भी विषय दूसरे से कमतर नहीं है। सभी विषयों के लोगों ने समाज में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अब जबकि हम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश बन गए हैं, क्या हम एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के योगदान को नजरअंदाज कर सकते हैं? क्या जैविक वैज्ञानिकों द्वारा विकसित टीकों के बिना दुनिया कोविड-19 से बच पाती? मानविकी के विषय विशेषकर साहित्य विज्ञान को कल्पना के पंख देते हैं और किसी भी बड़ी खोज के लिए मष्तिष्क पहले पहल कल्पना ही करता है। कल्पना के पंखों की उड़ान किसी भी रोकेट की उड़ान से तेज होती है।
एक छात्र के सामने आने वाली चुनौतियाँ हमेशा शैक्षणिक कारणों से ही नहीं होतीं। संसार में कोई भी परिवार समस्याओं से मुक्त नहीं होता। छात्र परिवार के भीतरी संघर्षों और आर्थिक समस्याओं से प्रभावित हो सकता है। यह वयस्कों की ज़िम्मेदारी है कि वे समस्याओं को इस तरह से प्रबंधित करें, जिससे बच्चे की भावनात्मक स्थिति को गंभीर रूप से नुकसान न पहुँचे। इस उम्र में पारस्परिक संबंधों को संभालना भी मुश्किल हो सकता है। मुश्किल समय में बच्चों के साथ रहना बेहद जरूरी है। जब स्कूल और कॉलेज किसी छात्र की भलाई के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं, तो माता-पिता को तुरंत प्रतिक्रिया देनी चाहिए। उनसे जुड़े रहना और अटूट भावनात्मक समर्थन प्रदान करना बच्चों को शैक्षणिक और व्यक्तिगत चुनौतियों से उबरने में मदद कर सकता है।
मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र के अध्ययन के उपरांत मेरा यह अवलोकन एवं निष्कर्ष है कि संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा छात्र, एकल परिवार से अलग-थलग रहने वाले छात्र की तुलना में भावनात्मक रूप से अधिक स्थिर होता है। दादा-दादी और दूर के रिश्तेदारों का समर्थन और स्नेह बच्चों में सकारात्मकता को बढ़ावा दे सकता है। बच्चों को दादा-दादी और अन्य रिश्तेदारों के साथ सक्रिय रूप से संवाद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जीवन पढ़ाई से परे भी है। बस इस बात को समझने से ही हमें अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत और सकारात्मक बनने में मदद मिल सकती है। अगर हमें अपने बच्चों को कथित असफलताओं से होने वाली निराशाओं का शिकार होने से रोकना है, तो मजबूती और सकारात्मकता ज़रूरी है। खुशी एक सामूहिक जिम्मेदारी है और उस पर सभी का हक है।
– डॉ. मनोज कुमार
लेखक – जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।
